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२२१  २१२१ १२२१ २१२

 

जब छीनने छुडाने के साधन नए मिले

हर मोड़ पर कई-कई सज्जन नए मिले

 

कुछ दूर तक गई भी न थी राह मुड़ गई

जिस राह पर फूलों भरे गुलशन नए मिले

 

काँटों से खेलता रहा कैसा जुनून था

उफ़! दोस्तों की शक्ल में दुश्मन नए मिले

 

जितने भी काटता गया जीवन के फंद वो  

उतने ही जिंदगी उसे बंधन नए मिले

 

अपनों से दूर कर न दे उनका मिज़ाज भी  

गलियों से अब जो गाँव की आँगन नए मिले

 

 

मौलिक/अप्रकाशित.

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 19, 2016 at 10:30pm

क्या कमाल की कहन के साथ क्या ही सशक्त ग़ज़ल हुई है ! वाह आदरणीय अशोक भाई जी.

हार्दिक शुभकामनाएँ और बधाइयाँ  

Comment by Ashok Kumar Raktale on July 19, 2016 at 9:54pm

आदरणीय समर कबीर साहब सादर नमस्कार, आपकी प्रतिक्रिया का मुझे इंतज़ार था. आप से दाद पाकर मेरा रचना कर्म सफल हुआ. आपके द्वारा सही कहा गया है "कर रहा" में एब आ गया था जिसे आपकी इस्लाह अनुसार मैंने बदल लिया है. पुनः आभार आपका. सादर.

Comment by Ashok Kumar Raktale on July 19, 2016 at 9:48pm

आदरणीय सुशील सरना साहब सादर नमन, प्रस्तुत गजल पर आपकी उपस्थिति और उत्सावर्धन के लिए हृदयातल से आभार. सादर.

Comment by Ashok Kumar Raktale on July 19, 2016 at 9:47pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी साहब सादर, प्रस्तुत गजल को पसंद करने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार. आपके सुझावों का दिल से स्वागत है. किन्तु  आपके द्वारा इंगित मिसरे पर आदरणीय समर साहब ने जैसे कहा है, वही मैं भी कहना चाहता हूँ की यह जिंदगी से कहा जा रहा है, इसलिए यहाँ 'में' का प्रयोग नहीं किया है. सादर.

Comment by Samar kabeer on July 19, 2016 at 8:38pm
जनाब अशोक कुमार रक्ताले साहिब आदाब,भाई क्या तारीफ़ करूँ आपकी ग़ज़ल की शब्द नहीं मिल रहे हैं,ऐसा लगता है किसी मंझे हुए ग़ज़लकार की ग़ज़ल है, बहुत ख़ूब वाह वाह इस शानदार प्रस्तुति पर ढेरों दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
जनाब गिरिराज भंडारी जी ने जिस शैर पर ऐतराज़ ज़ाहिर किया है में उससे सहमत नहीं,सानी मिसरा बिल्कुल साफ़ है,
"उतने ही ज़िन्दगी उसे बन्धन नए मिले"
यहां ज़िन्दगी को मुखातिब किया गया है इसलिए बात पूरी तरह स्पष्ट है, मुझे कोई कमी नहीं लगी ।
हाँ आख़री शैर के ऊला मिसरे में ऐब-ए-तनाफुर का दोष आ गया है "अपनों से दूर कर रहा उनका मिज़ाज भी"

"कर रहा" ये दोष इस तरह दूर हो सकता है अगर आप मुनासिब समझें तो :-

"अपनों से दूर कर न दे उनका मिज़ाज भी"
Comment by Sushil Sarna on July 19, 2016 at 7:24pm

काँटों से खेलता रहा कैसा जुनून था
उफ़! दोस्तों की शक्ल में दुश्मन नए मिले

वाह आदरणीय वाह ... बहुत ही खूबसूरत अशआर लिखे हैं आपने ... इस दिलकश ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय अशोक जी भाई साहिब।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 19, 2016 at 6:28pm

आदरणीय अशोक भाई , अच्छी गज़ल कही है , दिल से बधाइयाँ स्वीकार करें ।

बस - इस मिसरे में  --  उतने ही जिंदगी उसे बंधन नए मिले    --  में -  की कमी लगती है , बात अधूरी लग रही  है ।

उतने की हर क़दम उसे  बन्धन नये मिले  -- चाहें तो ऐसा किया जा सकता है

Comment by Ashok Kumar Raktale on July 19, 2016 at 7:25am

सादर आभार आदरणीया कल्पना भट्ट जी. सादर.

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 18, 2016 at 8:50pm

बढ़िया रचना हुई है आदरणीय | बधाई | 

कृपया ध्यान दे...

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