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जाने कितना प्रश्न करती

2122 2122 2122 2122
जाने कितना प्रश्न करती, और हरदम खिलखिलाती।
अपने मन में पीर जाने, कौन सी वो है छिपाती।।

जब मिली ज़िंदा हुआ हूँ, जब मिली मैं गुनगुनाया।
हर दफ़ा कागज़-कलम, की राह मुझको है दिखाती।।

उसके शब्दों से कोई कागज़ कभी भी जब सजाया।
खूब है हर बार ही वो तो ग़ज़ल बनकर रिझाती।

चूमती नज़रों से जब, मदहोश हो जाता हूँ मैं।
क्या कहूँ पगली वो लड़की, मुझको पागल है बनाती।।

कोई उसको बोल भी दो, ठीक ये बिल्कुल नहीं है।
प्यास सदियों की मिटा दे, रेत में आकर समाती।।

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 2, 2016 at 10:54pm
आदरणीय राहिला जी सादर शुक्रिया।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 2, 2016 at 10:54pm
आदरणीय समर कबीर सर सादर प्रणाम।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 2, 2016 at 10:53pm
आदरणीय सुशील सरन सादर आभार।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 2, 2016 at 10:53pm
आदरणीय आमोद जी सादर आभार, तारीफ सुन के अच्छा लगता है।
Comment by Rahila on April 2, 2016 at 10:47pm
बहुत बढ़िया गज़ल प्रस्तुत की आद.पंकज सर जी! इस बेहतरीन रचना के लिये बहुत बधाई ।सादर
Comment by Samar kabeer on April 1, 2016 at 3:08pm
जनाब पंकज कुमार मिश्रा जी आदाब,बढ़िया ग़ज़ल हुई,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ।
Comment by Sushil Sarna on April 1, 2016 at 1:54pm

आदरणीय इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई। 

Comment by amod shrivastav (bindouri) on March 31, 2016 at 9:03am
वाह्ह आ पंकज भाई जी बेहतरीन भाव

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