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सोच असुरों सी करो मत दोस्तो - ग़ज़ल

2122    2122    212
**********************  
कब   यहाँ   पर्दा  उठाया  जाएगा
कब  हमें  सूरज दिखाया  जाएगा /1

थक गए हैं झूठ  की उँगली पकड़
सच का दामन कब थमाया जाएगा /2

सब   परेशाँ   तीरगी   से   दोस्तो
कब  दिया  कोई  जलाया जाएगा /3

है  सुरक्षा  खाद्य  की   कानून में
पर अनाजों  को  सड़ाया  जाएगा /4

दूर महलों से खड़ी कुटिया में फिर
इक  निवाला  बाँट  खाया जाएगा /5

यह समय है झूठ का कहते है सब
राम  को  रावण  बताया  जाएगा /6

सोच असुरों  सी करो  मत दोस्तो
खून  से  खुद के नहाया  जाएगा /7

***********************
मौलिक व अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

Views: 664

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 10, 2016 at 10:57am

आ० भाई तेजवीर जी उपस्थिति और ग़ज़ल का अनुमोदन करने के लिए हार्दिक धन्यवाद l

Comment by सूबे सिंह सुजान on March 9, 2016 at 10:31pm
अच्छी सोच के साथ ग़ज़ल पेश की है बहुत सुंदर
Comment by Samar kabeer on March 9, 2016 at 6:03pm
जनाब लक्ष्मण धामी'मुसाफ़िर'जी आदाब,बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ।
Comment by ram shiromani pathak on March 9, 2016 at 5:44pm
वाह भाई आनंद आ गया।।हार्दिक बधाई
Comment by narendrasinh chauhan on March 9, 2016 at 1:42pm

खूब सुन्दर ग़ज़ल के हार्दिक बधाई

Comment by TEJ VEER SINGH on March 9, 2016 at 1:26pm

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी जी!बेहतरीन गज़ल!

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