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धन के बल पर नदी मुहाने -ग़ज़ल-(लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )

2222    2222    2222    222
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कौन कहेगा  यारो  बोलो बस्ती की मनमानी की
दोष लगाता हर कोई है गलती कहकर पानी की /1

राह रही जो नदिया की वो घर आगन सब रोक रहे
खादर  बंगर पाट रखी  है  नींव नगर रजधानी की /2

भीड़ बड़ी हर ओर  साथ  ही कूड़े का अम्बार बढ़ा
धन के बल पर नदी मुहाने आज पँहुच शैलानी की /3

हम को नादाँ  कहकर कोई बात न कहने देते पर
यार सयानों ने हर दम ही बात बहुत बचकानी की /4

माना सुविधाओं का यारा महलों में अम्बार बहुत
नींद मगर कहते हैं अच्छी टूटी छप्पर छानी की /5

सुनने का होता मन जब भी यार कथा तन्हाई में
आँखों का घट भर जाती हैं यादें दादी नानी की /6

मौलिक व अप्रकाशित

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 24, 2016 at 11:48am

आ० भाई सतविंदर जी ग़ज़ल पर उपस्थिति, प्रशंसा और त्रुटि की ओर ध्यान दिलाने के लिए आभार l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 24, 2016 at 11:46am

आ० भाई बैजनाथ जी हार्दिक आभार l

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 21, 2016 at 9:52pm
बेहद सुंदर ग़ज़ल।हार्दिक बधाई आदरणीय धामी जी।

//राह रही जो नदिया की वो घर आगन सब रोक रहे//

में शब्द आगन है या आँगन कृपया देख लें।
Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on February 20, 2016 at 3:10pm

आदरणीय लक्ष्मण साहेब ..........बहुत बढ़िया ....बधाई !!!

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 18, 2016 at 12:38pm

आ० भाई तेजवीर जी , ग़ज़ल को समय देने के लिए हार्दिक आभार l

Comment by TEJ VEER SINGH on February 17, 2016 at 11:23am

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी जी!बेहतरीन गज़ल!

हम को नादाँ  कहकर कोई बात न कहने देते पर
यार सयानों ने हर दम ही बात बहुत बचकानी की 

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