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चोट खाकर देखिए-ग़ज़ल-(लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )

2122    2122    2122    212

इस नगर में हर किसी को इक फसाना चाहिए
ऊँघते  को  ठेलते  का  इक  बहाना  चाहिए /1

कब से ठहरा ताल अब तो मारिए कंकड़ जरा
जिंदगी का लुत्फ  कुछ तो  यार आना चाहिए /2

बेबसी क्यों  ओढ़नी  जब हाथ लाठी कर्म की
द्वार किस्मत का चलो अब खटखटाना चाहिए /3

चोट खाकर देखिए खुद दर्द की तफतीस को
बोलना  फिर  दर्द में  भी  मुस्कुराना चाहिए /4

हो गयी हो पीर  पर्वत  हर दवा जब बेअसर
आँसुओं को किसलिए फिर छलछलाना चाहिए /5

ये हवाएँ  मौसमी  हैं  इनसे डरना व्यर्थ है
इन हवाओं की झड़ी को घर पुराना चाहिए /6

हो गए हैं जाल जर्जर मौसमों की मार से
अब परिंदों पंख तुमको फड़फड़ाना चाहिए /7

मौलिक व अप्रकाशित

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 18, 2016 at 12:37pm

आ० भाई तस्दीक अहमद जी उपस्थिति और प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार l

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 17, 2016 at 3:13pm

जनाब लक्ष्मण  धामी  साहिब , अच्छी ग़ज़ल कही आपने , मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 17, 2016 at 11:19am

आ0 भाई समर कबीर जी गजल की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद । आपके द्वारा इंगित शेर में तफतीस के स्थान पर सही शब्द तफतीश है जिसका अर्थ जाँच परख से है । यहाँ पर आप समझने या अनुभव करने के संदर्भ में ले सकते हैं। वैसे यहाँ पर तासीर या तफसील शब्द का प्रयोग भी किया जा सकता है ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 17, 2016 at 11:19am

आ0 भाई तेजवीर जी, उपस्थिति और प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by Samar kabeer on February 15, 2016 at 11:17pm
जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी,आदाब,शानदार ग़ज़ल कही है आपने,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।

"चोट खाकर देखिए खुद दर्द की तफतीस को"

इस मिसरे में "तफतीस" का अर्थ समझ नहीं पाया,बताने का कष्ट करें ।
Comment by TEJ VEER SINGH on February 15, 2016 at 7:38pm

हार्दिक बधाई  आदरणीय लक्ष्मण धामी जी!बेहतरीन गज़ल!

हो गयी हो पीर  पर्वत  हर दवा जब बेअसर
आँसुओं को किसलिए फिर छलछलाना चाहिए 

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