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तुम्हारी सोच में फिरका -ग़ज़ल -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर "

1222    1222    1222    1222

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सदा सम्मान  इकतरफा  कहाँ तक  फूल  को दोगे
तिरस्कारों  की हर गठरी  कहाँ  तक शूल को दोगे /1

उठेगी  तो करेगी  सिर से  पाँवों तक बहुत गँदला
अगर तुम प्यार का कुछ जल नहीं पगधूल को दोगे /2

नदी  आवारगी  में  नित  उजाड़े  खेत  औ  बस्ती
कहाँ तक दोष इसका  भी कहो  तुम कूल को दोगे /3

तुम्हारी  सोच  में  फिरके  उन्हें ही पोसते हो नित
सजा  तसलीमा  रूश्दी को  दुआ मकबूल को दोगे /4

अगर चाहे भी वो दिल से बदल फितरत को डालू पर
पता  है   एक  भी  मौका  नहीं  तुम  शूल  को  दोगे /5

कहा  है सच  बुजुर्गो ने  सुलझ जाएगा हर मसला
जरा  सा वक्त  गर  अपनी   पुरानी  भूल को दोगे /6

कहाँ  जीवन  में  रंगत  कुछ बचेगी  यार बतलाओ
अगर  तरजीह  राहों   में   हवा   अनुकूल  को  दोगे /7

ये जीवन  नाम  है  उसका  जहाँ  अच्छा बुरा सब है
मगर  पतवार  की  गलती  सजा  मस्तूल को दोगे ? /8
******************************************************
मौलिक और अप्रकाशित

लक्ष्मण धामी "मुसाफिर "

Views: 293

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 15, 2016 at 12:37pm


आ0 भाई रवि शुक्ला जी गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 15, 2016 at 12:36pm


आ0 भाई तेजवीर जी आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 15, 2016 at 12:36pm

आ0 भाई जयनित कुमार जी उपथिति के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 15, 2016 at 12:36pm

आ0 भाई मिथिलेश जी प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 15, 2016 at 12:35pm

आ0 भाई समर कबीर जी प्रशंसा और त्रुटि की ओर ध्यान दिलाने के लिए हार्दिक धन्यवाद ं

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 15, 2016 at 12:35pm

आ0 भाई श्यामनरायण जी, गजल का अनुमोदन करने हेतु हार्दिक आभार ।

Comment by Ravi Shukla on February 11, 2016 at 1:32pm

आदरणीय लक्ष्‍मण जी बढि़या ग़ज़ल कही है आपने शेर दर श्‍ोर बधाई कुबूल करिये

Comment by TEJ VEER SINGH on February 10, 2016 at 2:45pm

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी जी!बेहतरीन गज़ल!

कहा  है सच  बुजुर्गो ने  सुलझ जाएगा हर मसला
जरा  सा वक्त  गर  अपनी   पुरानी  भूल को दोगे 

Comment by जयनित कुमार मेहता on February 9, 2016 at 9:48pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी,अच्छी ग़ज़ल कही आपने।।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 9, 2016 at 8:21pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी सर जी शानदार ग़ज़ल पर शेर दर शेर दाद हाज़िर है।

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"आ. भाई समर कबीर जी, सादर अभिवादन । आपकी उपस्थिति व स्नेह पाकर गजल मुकम्मल हुई । हार्दिक आभार ।"
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