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जनाब जयनित कुमार साहिब , अच्छी ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं। ..... उर्दू के हिसाब से शहर को वज़न 21 में ही बाँधा जाता है जनाब रवि साहिब दुरुस्त फरमा रहे हैं
कहेगा जो सच तो कटेगी जुबां
छुपा बेगुनाही, सफाई न दे....शानदार ,हार्दिक बधाई आ.जयनित कुमार मेहता जी !
kहूब ग़ज़ल ..क्या कहने वाह
वाह बहुत ही खूबसूरत अशआर हुए हैं आदरणीय। दिल से दाद कबूल फरमाएं और हाँ आदरणीय रवि शुक्ला जी का कथन ज्ञान की एक और सीढ़ी दर्शाती है। इस हेतु उनका भी हार्दिक आभार।
teesra she'r kuchh hlakaa laga mtira - but pooree gazal achhee hai badhaee bandhu
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