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 पौरुष ने उठाया हाथ

सहनशीलता  ने

कर तो लिया बर्दाश्त

पर चेहरा विकृत हुआ

अधर काँपे

आँखे पनिआयी 

झट वह चौके में चली गयी

बेटी दौड़ी-दौड़ी आयी

क्या हुआ माँ ?

कैसी आवाज आयी ?

और यह क्या तू रोती है ?

नहीं बेटी, ये लकड़ियाँ ज़रा गीली है

धुंआ बहुत देती है

आँख में गडता है, पानी निकलता है

बेटी ने कहा – ‘ माँ !

गीली लकड़ी का

तुमसे क्या सम्बन्ध है ?

माँ ने कहा ‘ हम दोनों

जलती कम

और सुलगती ज्यादा हैं I’

‘और यदि लकड़ी सूखी हो,,तो  ?’

‘तो चिता बन जाती है

खुद भी जलती है

औरों को भी जलाती है’

‘तो माँ !

तुम चिता कब बनोगी ?’

(मौलिक व् अप्रकाशित )

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 16, 2015 at 3:27pm

तुम चिता कब बनोगी ?’  क्या बात है बड़े भाई  गोपाल जी , वाह , सटीक प्रश्न , बहुत सुन्दर कविता लगी आपकी , आपको हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by pratibha pande on November 15, 2015 at 12:46pm

चिता की लकड़ी या गीली लकड़ी ,,इन दोनों  से हटकर एक हरी भरी लकड़ी क्यों नहीं बन पातीं ,   बहुत गहरे प्रश्न कर रही है आपकी रचना आदरणीय 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 14, 2015 at 11:46am

आ० पंकज जी - बहुत बहुत शुक्रिया .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 14, 2015 at 11:45am

आ० मिथिलेश जी - आपके प्रोत्साहन से बल मिला . सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 14, 2015 at 11:44am

आ० सौरभ जी - आपका आशीर्वाद मेरे लिए सदैव विशेष रहता है , सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 14, 2015 at 11:44am

आ० अजय  कुमार जी -  आपका कृतज्ञ  हूँ .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 14, 2015 at 11:42am

आ० राहिला जी आपका आभार .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 12, 2015 at 11:48pm

आदरणीय गोपाल सर, कविता ने बहुत गहरे तक प्रभावित किया और झिंझोड़ दिया. आपने कथ्य के मर्म को जैसा शाब्दिक किया है वह चकित करता है. इस उत्कृष्ट प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 12, 2015 at 11:14pm

आदरणीय गोपाल नारायनजी, आपकी इस कविता से मन सुन्न है.  स्त्रियों की दुर्दशा पर ऐसी सटीक रचना हाल-फिलहाल में मंच पर पोस्ट नहीं हुई है. आपकी संवेदनशीलता पर मैं अभिभूत हूँ. इस सशक्त रचना के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय.

Comment by Ajay Kumar Sharma on November 12, 2015 at 10:54pm

आदरणीय गोपाल सर अद्वितीय लेखन। मार्मिक रचना । मन को द्रवित कर गयी।

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