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हाँ, तुम बंट गए उस दिन कबीर

 

अहो कबीर !

कही पढा था या सुना

तम्हारी मृत्यु पर

लडे थे हिन्दू और मुसलमान 

जिनको तुमने

जिन्दगी भर लगाई फटकार

वे तुम्हारी मृत्यु पर भी

नहीं आये बाज

और एक

तुम्हारी मृत देह को जलाने   

तथा दूसरा दफनाने  

की जिद करता रहा

और तुम

कफ़न के आवरण में बिद्ध

जार-जार रोते इस  मानव प्रवृत्ति पर 

अंततः हारकर मरने के बाद भी  

तुमने किया था स्वरुप परिवर्तन  

क्योंकि हटाया गया

कफ़न जब तुम्हारा

नहीं था वहां पर कोई मृत शरीर

केवल पड़े थे दो ताजे फूल 

जिन्हें दो समुदायों ने

आपस मे बाँट लिया

हाँ, तुम बंट गए उस दिन कबीर  

और यह बंटवारा

किया तुम्हारे शिष्यों ने 

साक्षी है वह भूमि

जहां तुमने त्यागे प्राण

 

आज भी वहां पर हैं

दिखती दो समाधियाँ

करती हुयी ऐलान

कि वह मन्त्रदाता, वह योगी, वह संत

जिसने किया था पाखण्ड का विरोध   

बंट गया मगहर में   

लोगों की जिद से

आमी का अमिय जल

हुआ उसी क्षण कसैला

जहां स्नान-पान कभी

करते थे तुम कबीर ! 

 

(मौलिक व् अप्रकाशित)

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Comment by LOON KARAN CHHAJER on January 8, 2016 at 6:02pm

आज भी वहां पर हैं

दिखती दो समाधियाँ

करती हुयी ऐलान

कि वह मन्त्रदाता, वह योगी, वह संत

जिसने किया था पाखण्ड का विरोध   

बंट गया मगहर में   

लोगों की जिद से

बहुत खूब। ..बधाई

Comment by Shyam Narain Verma on December 30, 2015 at 1:02pm
बहुत सुन्दर ... सादर बधाई स्वीकारें आदरणीय
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 28, 2015 at 8:34am
बहुत ही सटीक एवम् सुंदर शब्दाभिव्यक्ति के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय।
Comment by Satyanarayan Singh on December 27, 2015 at 10:12pm

कबीर के  हिन्दू-मुस्लिम शिष्य उनके मृत्युपरांत शव को लेकर आपस में उलझे उन अज्ञानी शिष्यों को उनकी मृत्यु भी एक दृष्टांत का कारण बनी  रचना के माध्यम से  इस गूढ़ ज्ञान को साझा करने  हेतु  आदरणीय डॉ. गोपाल नारायन सादर बधाई स्वीकार करें.  

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 27, 2015 at 9:24pm

आ०  सौरभ पांडेयजी -आपके टीप का स्वागत करता हूँ , सादर .  

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 27, 2015 at 9:22pm

आ० कांता रॉय जी - आप्यायित हुआ सादर . 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 27, 2015 at 9:21pm

प्रिय जान - बहुत बहुत आभार . 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 27, 2015 at 9:21pm

आ० विजय निकोर जी - सादर चरणस्पर्श . 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 27, 2015 at 9:20pm

आ० लडी वाला जी- आपका बहुत बहुत आभार . 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 27, 2015 at 9:19pm

आ० विजय सर !  अनुग्रहीत हुआ सादर . 

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