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सहसा

छा जाता है आवेश

कुछ लगता है सनसनाने

मस्तिष्क में होने लगता है

घमासान 

हाथ हठात पहुँचते है

लेखनी पर

इतना भी नहीं होता

कि तलाश लें

कोई कायदे का कागज

नोच लेता है हाथ

किसी अखबार का टुकड़ा

या किसी रद्दी का खाली भाग 

और दौड़ने लगते है उस पर

अक्षर निर्बाध 

अवचेतन सा मन

मानो कोई उड़ेल देता है

उसमें भावों की सम्पदा  

जो स्वस्थ चित्त में

चाह कर भी नहीं उभरता  

वह अभिव्यक्त हो जाता है

उस आवेश में

स्वतः अपने आप

और हम कहते हैं उसे

कविता

.(अप्रकाशित-मौलिक )

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 7, 2015 at 11:21pm

मनसभूमि पर कविता के जन्म लेने से कागज़ पर उतरने की प्रक्रिया को यथा शब्द दिए हैं आ० गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी 

बधाई

Comment by Abid ali mansoori on November 5, 2015 at 4:26pm

मानो कोई उड़ेल देता है

उसमें भावों की सम्पदा  

जो स्वस्थ चित्त में

चाह कर भी नहीं उभरता  

वह अभिव्यक्त हो जाता है

उस आवेश में!

वधाई आदरणीय गोपाल नारायन जी!

Comment by Shyam Narain Verma on November 5, 2015 at 3:13pm

" अच्छी प्रस्तुति आदरणीय ,बधाई ................. "

Comment by Sushil Sarna on November 5, 2015 at 1:34pm

मानो कोई उड़ेल देता है
उसमें भावों की सम्पदा
जो स्वस्थ चित्त में
चाह कर भी नहीं उभरता
वह अभिव्यक्त हो जाता है
उस आवेश में
स्वतः अपने आप
और हम कहते हैं उसे
कविता

सच काव्य उत्पति का कितना सुंदर चित्रण किया है … बिलकुल सही बात कही है आपने कागज़ के सामने आते ही लेखनी स्वयमेव उसपर शब्दों के घुँघरू बाँध अंतर्भावों की लय पर नृत्य करने लगती है और एक गीत का सृजन हो जाता है। इस सुंदर भावाभिव्यक्ति के लिए हृदय से बधाई स्वीकार करें आदरणीय डॉ गोपाल जी भाई साहिब।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 5, 2015 at 12:25pm

आदरणीय गोपाल सर, कविता की रचनाप्रक्रिया के आधार पर कविता को परिभाषित करती बढ़िया कविता हुई है. इस प्रस्तुति पर आपको बहुत बहुत बधाई.

कृपया ध्यान दे...

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