For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल : ख़तरे में गर हो आब तो लोहा उठाइये

बह्र : २२१ २१२१ १२२१ २१२

हों जुल्म बेहिसाब तो लोहा उठाइये

ख़तरे में गर हो आब तो लोहा उठाइये

 

जिसको चुना है दिन की हिफ़ाजत के हेतु वो

खा जाए आफ़ताब तो लोहा उठाइये

 

भूखा मरे किसान मगर देश के प्रधान

खाते मिलें कबाब तो लोहा उठाइये

 

पूँजी के टायरों के तले आ के आपके

कुचले गए हों ख़्वाब तो लोहा उठाइये

 

फूलों से गढ़ सकेंगे न कुछ भी जहाँ में आप

गढ़ना हो कुछ जनाब तो लोहा उठाइये

-------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 843

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 11, 2015 at 7:16pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीया कान्ता जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 11, 2015 at 12:31pm

आदरणीया धर्मेन्द्र भाई , आपकी गज़ले हमरे लिये पाठशाला होती हैं । बहुत अच्छी गज़ल कही है ।

एक प्रश्न का हल खोजते थक गया हूँ , आप ही हल कर सकते हैं , आपने,    लोहा उठाइये क्यों कहा  जब कि आप अच्छी तरह खंज़र शब्द से वाकिफ हैं , क्या राज़ है , कि आप  खंज़र उठाइये नही कहे , क्यों कि आप यूँ ही कोई बात नहीं कहते , मै तो सोच नही पाया । सादर ॥

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 10, 2015 at 8:47pm

वाह क्या बात है . सुन्दर ,

Comment by mohinichordia on July 10, 2015 at 11:07am

 व्यवस्था पर गहरी चोट करती रचना लिखी आपने ,  साधुवाद .

Comment by विनय कुमार on July 9, 2015 at 11:05pm

// जिसको चुना है दिन की हिफ़ाजत के हेतु वो
खा जाए आफ़ताब तो लोहा उठाइये // , वाह , वाह । बेहद शानदार पंक्तियाँ , बधाई क़ुबूल कीजिये आदरणीय..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 9, 2015 at 10:27pm

आदरणीय धर्मेन्द्रजी, आपकी यह ग़ज़ल आपकी विशेष रंग वाली ग़ज़लों का अगला शेड है. इन ग़ज़लों का अपना ही मज़ा है. मैं तो खूब मज़े लेता हूँ.

दाद दाद दाद ! ... बधाई धर्मेन्द्रजी. और हार्दिक शुभकामनाएँ.

वैसे, मैं होता एक और शेर कहता -
साहित्य और वाद को आपस में घोल कर
रचना करें जनाब तो लोहा उठाइये ..  

:-)))
शुभेच्छाएँ

Comment by Rahul Dangi Panchal on July 9, 2015 at 9:34pm
बहुत ही अच्छी गजल हुई है आदरणीय बधाई स्वीकार करें
Comment by Sushil Sarna on July 9, 2015 at 8:04pm

हों जुल्म बेहिसाब तो लोहा उठाइये
ख़तरे में गर हो आब तो लोहा उठाइये

वाह क्या बात है … बहुत सुंदर प्रस्तुति … हार्दिक बधाई आदरणीय।

Comment by kanta roy on July 9, 2015 at 6:22pm
वाह !!!! क्या जज्बात है ..... बडी़ दिलेरी है आपकी इन पंक्तियों में ... लोहा उठाने का लगता है अब वक्त आन पडा़ है । बेहतरीन रचना आदरणीय घर्मेन्द्र कुमार जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 9, 2015 at 4:21pm
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीया परी जी

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
22 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Thursday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Thursday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Tuesday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service