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मटमैले सपने ( लघुकथा )

उसका सपना था कि वो अंतरिक्ष में जाये , उस धवल और खूबसूरत चाँद को छुए जिसके बारे में वो पढ़ती रही थी | आखिरकार उसे दाखिला मिल गया विदेश की एक यूनिवर्सिटी में |
लेकिन पैसों का इंतज़ाम , ऐसे में याद आया वो |
" तुझे चाँद छूने से कोई नहीं रोक सकता ", वादे पर ऐतबार करके उसके साथ निकल गयी बत्तियों से जगमगाते महानगर की ओर |
अब उस सीलन भरे कोठे में रातों को चांद , सपनों की तरह बहुत मटमैला दिखता था |
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on July 3, 2015 at 2:02am

बहुत बहुत आभार आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 3, 2015 at 1:48am

ऐसे नहीं होता भाईजी..  प्रस्तुति के लिए शुभकामनाएँ

Comment by विनय कुमार on June 25, 2015 at 10:08pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय मिथलेश वामनकर जी.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on June 25, 2015 at 2:09am

आदरणीय विनय जी बधाई इस सफल लघुकथा पर 

Comment by विनय कुमार on June 13, 2015 at 11:51pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय कृष्ण मिश्रा जान गोरखपुरी जी.

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 13, 2015 at 10:51pm

भाई विनय कुमार ज़ी,सुन्दर लघुकथा हार्दिक बधाई!

Comment by विनय कुमार on June 11, 2015 at 2:32pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय गिरिराज भंडारी जी .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 11, 2015 at 1:36pm

आदरणीय विनय भाई , समाज के काले पक्ष को दिखाती आपकी कथा के लिये बधाई आपको ।

Comment by विनय कुमार on June 10, 2015 at 5:10pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय शुभ्रांशु पाण्डेय जी ..

Comment by Shubhranshu Pandey on June 10, 2015 at 3:25pm

आदरणीय विनय जी,

सुन्दर कथा. राजेश कुमारी के कथन पर ध्यान देंगे..

सादर.

कृपया ध्यान दे...

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