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“माँ! तुम कह रही थी न,  शादी कर ले ! सोचता हूँ, कर ही लूँ।“

“कोई पसंद है क्या ? बता दे ?”

“हाँ पसंद तो है । मेरे साथ काम करती है। तुम्हें और पिता जी को ऐतराज तो नहीं होगा ?“

“हमें क्यों ऐतराज होगा भला ! तेरी खुशी में ही हमारी खुशी है। पर हाँ! लड़की मांगलिक नही होनी चाहिए!, अपने से छोटी जाति की भी नहीं , और स्वागत में कोई कमी भी न हो !“

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by MAHIMA SHREE on May 1, 2015 at 5:53pm

आ. जितेन्द्र जी, आपकी सकरात्मक प्रतिक्रिया के लिए आभार

Comment by MAHIMA SHREE on May 1, 2015 at 5:51pm

आ. लक्ष्मण सर, अापका आभार , पर आपने ठीक से पढ़ा नहीं  शायद..सादर

Comment by MAHIMA SHREE on May 1, 2015 at 5:49pm

आदरणीय विजय शंकर सर .. कथा पसंद करने के लिए आपका हार्दिक आभार, सादर

Comment by Vivek Jha on May 1, 2015 at 12:30pm

अच्छी लघुकथा है महिमा दी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 1, 2015 at 12:25pm

आदरणीया महिमा जी , अच्छी लघुकथा और सटीक शर्तें  !! आपको कथा के लिये बधाई ॥


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 1, 2015 at 12:02pm

महिमा श्री लघुकथा ये हुई !

इस सुन्दर प्रस्तुति को पढ़ गया और बिना किसी मॉडिफिकेशन के बने रहने दे रहा हूँ. नो इफ़्स-बट.. जो है सो ऐसे ही..

बहुत-बहुत बधाई..

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 1, 2015 at 11:59am

वाह महिमा जी -------------कोई ऐतराज न रहने पर इतने प्रतिबन्ध .बहुत कम शब्दों में आपने दमदार बात की . बधाई .

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 1, 2015 at 11:15am

सुंदर प्रस्तुति ,आदरणीया महिमा जी. आजकल या कहें हमेशा से रिश्तों में शर्तें तो ऐसे ही लागू रही है या होती रहीं है.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 1, 2015 at 10:59am

कोई एतराज नहीं पर हाँ - - - - - - - - पर लड़की के मौन ने सब कह दिया | सुंदर लघु कथा के लिए बधाई 

Comment by Dr. Vijai Shanker on May 1, 2015 at 9:58am
ऐतराज नहीं , सिर्फ शर्तें हैं , कुछ बीस- पचीस.
लघु - कथा अच्छी है, बधाई , आदरणीय सुश्री महिमा श्री जी, सादर।

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