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तरही ग़ज़ल....-महिमा श्री

1.बरसों के बाद खुद को यूँ पहचान तो गया

 सीने में दफ्न इश्क जुनूं जान तो गया

2.बीती तमाम उम्र तेरी  आरज़ू में बस

 चाहत भरा सफ़र हो ये अरमान तो गया

3.हमको कहाँ खबर थी कि दिल हार जाएगें

  छो़ड़ो चलो कि दिल तेरे कुर्बान तो गया

4.मांगा खुदा से जिसको था सजदों में बारहा

 मुझको वो मेरे नाम से पहचान तो गया

5. हमसे न हो सके थे जमाने के चोंचले

सब खुश हुए कि दौड़ से नादान तो गया

यह भी कि------------

6. बेशक ज़मीर बेच के कुर्सी बचाई है

 हांथों से उसके आज लो ईमान तो गया

मौलिक एवं अप्रकाशित

 

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Comment

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Comment by MAHIMA SHREE on April 2, 2015 at 2:55pm

ग़जल पर आपकी उपस्तिथि हर्ष कारक है आ.जवाहर सर... सराहने के लिए बहुत बहुत आभार

Comment by MAHIMA SHREE on April 2, 2015 at 2:53pm

सराहने के लिए बहुत-2 आभार आ. जितेन्द्र जी 

Comment by MAHIMA SHREE on April 2, 2015 at 2:52pm

आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी ..ही एक्स्ट्रा आ गया था मैंनें हटा दिया है..ध्यानाकर्षण के लिए धन्यवाद

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on April 2, 2015 at 9:35am

खूबसूरत गजल कहने के सिवा ज्यादा कुछ कह नहीं सकता ..हाँ अंतिम पक्तियां 

बेशक ज़मीर बेच के कुर्सी बचाई है

 हांथों से उसके आज लो ईमान तो गया  ...ज्यादा समझ आयी है ...दरअसल मैं गजल की बारीकियों से बिलकुल अंजान हूँ ...सोचता हूँ लिखने का प्रयास करूं और इसी मंच से लोगों से सीखूं...सादर महिमा बहन! 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 2, 2015 at 9:28am

हमसे न हो सके थे जमाने के चोंचले

सब खुश हुए कि दौड़ से नादान तो गया.....बहुत खूब. सबसे पसंदीदा अशआर

बेशक ज़मीर बेच के कुर्सी बचाई है

हांथों से उसके आज लो ईमान तो गया.......वाह! आजकल ईमान और जमीर बस नाम के ही हैं.

इस बेहतरीन गजल पर आपको बधाई ,आदरणीया महिमा जी.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 1, 2015 at 11:35pm

आदरणीया महिमा जी बेहतरीन तरही ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाएं 

बीती तमाम उम्र तेरी ही आरज़ू में बस......... बह्र में ही पर पुनः विचार कीजियेगा. 

सादर 

Comment by MAHIMA SHREE on April 1, 2015 at 9:27pm

 ग़ज़ल पसंद करने के लिए..आपका बहुत बहुत आभार आ. वंदना जी..

   //चौथे शेर के  मिसरा ऊला में बारहा शब्द दोष उत्पन्न कर रहा है //

 ध्यानाकर्षण के लिए आभारी हूँ   देखती हूँ... सादर

Comment by MAHIMA SHREE on April 1, 2015 at 9:22pm

सराहने के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया आ. गोपाल नारायण  जी,सादर

Comment by MAHIMA SHREE on April 1, 2015 at 9:21pm

आपका हार्दिक आभार आ. विजय शंकर जी..सादर

Comment by MAHIMA SHREE on April 1, 2015 at 9:20pm

 ग़ज़ल पर समय देने और सराहने के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया आ. सुशील सरना जी,सादर

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