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कहते हैं इल्ज़ाम छुपाकर रक्खा है
मैंने तेरा नाम छुपाकर रक्खा है.
.
झाँक के देखो मेरी इन आँखों में तुम
अनबूझा पैग़ाम छुपाकर रक्खा है.
.
शायद वो हो मुझ से भी ज़्यादा प्यासा
उसकी ख़ातिर जाम छुपाकर रक्खा है.
.
जिसको तुम सब कहते हो ईमाँ वाला,
उसने अपना दाम छुपाकर रक्खा है.
.  
आया है वो आज जुबां पर गुड लेकर
शायद कोई काम छुपाकर रक्खा है.
.
मस्जिद की दीवार किनारे तुलसी ने
अपने मन का राम छुपाकर रक्खा है.  
.
लोग भला समझेंगे इस रिश्ते को क्या
‘नूर’ इसे गुमनाम छुपाकर रक्खा है.
.
नूर 

मौलिक/ अप्रकाशित 

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 26, 2015 at 9:09pm

शुक्रिया डॉ. श्रीवास्तव साहब 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 26, 2015 at 9:09pm

शुक्रिया श्याम जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 26, 2015 at 9:09pm

शुक्रिया भाई उमेश जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 26, 2015 at 9:09pm

शुक्रिया आ.समर कबीर साहब 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 26, 2015 at 8:58pm

मस्जिद की दीवार किनारे तुलसी ने
अपने मन का राम छुपाकर रक्खा है   ------ वाह वाह नूर भाई . बेहतरीन कही.  सादर .
.

Comment by Shyam Mathpal on March 26, 2015 at 7:56pm

आ.नीलेश जी. हार्दिक बधाई .  बहुत खूब .क्या कहने.

Comment by umesh katara on March 26, 2015 at 7:00pm

वाह वाह वाह सर उम्दा

Comment by Samar kabeer on March 26, 2015 at 6:30pm
जनाब निलेश "नूर" जी,आदाब,ख़ूबसूरत अशआर से सजी ग़ज़ल के लिये शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं |
Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 26, 2015 at 6:22pm

शुक्रिया दिनेश कुमार जी ...दिल से 

Comment by दिनेश कुमार on March 26, 2015 at 5:49pm
किस शे'र की तारीफ़ करें आ० निलेश जी, सभी बहुत खूब हुए हैं। वाह वाह वाह। हार्दिक दाद क़ुबूल करें सर जी।
मस्जिद की दीवार किनारे तुलसी ने
अपने मन का राम छुपाकर रक्खा है. .... Exceptional

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