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एक सत्यान्वेषी ,
मुक्ति का अभिलाषी
था उर्ध्वारोही।
कर रहा था आरोहण
पर्वत की दुर्लंघ्य ऊचाईयां का।
पर्वत से उतरती नदी ने कहा :
मैदानों में तो जीवन कितना सरल , सुगम है,
यहाँ जीवन है कितना दुष्कर।
अविचलित रहकर इसपर
दिया उसने उत्तर
मैंने भीतर जाकर देखा है,
वाह्य सौंदर्य तो धोखा है।
मैदानों में जीवन सरल है,
पर राह लक्ष्य की वक्र है।
जीवन रथ मे लगे
कर्म फल के दुष्चक्र हैं।
मैं राह सीधी लेना चाहता हूँ।
इसलिए नीचे से ऊपर जाना चाहता हूँ ।
दोनों महार्णव मिलन को आतुर
चल दिये,
अपने अपने यौक्तिक मार्ग पर ।
नदी नीचे जाकर लवण बन गयी।
........
मौलिक एवं अप्रकाशित 
……….
MOB No. 08873257666

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Comment

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Comment by Neeraj Neer on February 25, 2015 at 3:40pm

बहुत बहुत धन्यवाद अदरणीय हरी प्रकाश जी ॥ 

Comment by Neeraj Neer on February 25, 2015 at 3:40pm

आभार आपका आदरणीय जितेंद्र भाई । इधर समय नहीं मिल पाया ॥ 

Comment by Neeraj Neer on February 25, 2015 at 3:39pm

इस प्रोत्साहन हेतू आपका हार्दिक आभार अदरणीय खुर्शीद जी । 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 25, 2015 at 10:49am

आदरणीय नीरज जी ,सुन्दर प्रस्तुति ,बधाई आपको !

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 25, 2015 at 10:46am

आदरणीय नीरज जी, बहुत समय के बाद आपकी रचना पढने को मिली. इस गहन प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई स्वीकारें

Comment by khursheed khairadi on February 25, 2015 at 9:58am

मैंने भीतर जाकर देखा है, 
वाह्य सौंदर्य तो धोखा है। 
मैदानों में जीवन सरल है, 
पर राह लक्ष्य की वक्र है। 

आदरणीय नीरज जी ,बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हैं |हार्दिक बधाई स्वीकार करें |सादर अभिनन्दन |

Comment by Neeraj Neer on February 25, 2015 at 8:48am

हार्दिक धन्यवाद इस प्रोत्साहन हेतू आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी ॥ 

Comment by Neeraj Neer on February 25, 2015 at 8:47am

आभार आपका महर्षि त्रिपाठी जी ॥ 

Comment by Neeraj Neer on February 25, 2015 at 8:47am

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव साहब आपकी सलाह शिरोधार्य है। हार्दिक आभार आपका। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 25, 2015 at 1:55am

आदरणीय नीरज जी इस सुन्दर प्रस्तुति पर आपको बहुत बहुत बधाई

कृपया ध्यान दे...

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