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क्या आप सच में वैसे ही हैं ? --- अतुकांत ( गिरिराज भंडारी )

मेरे सबसे प्रिय रचनाकार  

कभी प्रत्यक्ष मिला नहीं आपसे

सपना है मेरा ,

आपसे मिलना , बातें करना

घंटों ,

किसी झील के किनारे

सूनसान में

 

आपकी हर रचनायें

गढती जाती है

मेरे अन्दर आपको

बनती जाती है

आपकी छवि ,

कभी धुंधली , कभी चमक दार , साफ साफ

क़ैद है मेरे दिलो दिमाग़ में

आपकी रचनाओं की सारी खूबियों के साथ

आपकी एक बहुत प्यारी छवि

 

क्या आप सच में वैसे ही हैं

जैसी आपकी रचनायें बनातीं हैं आपको

मन डरता भी है

कभी कभी

सोचने लगता है  

आपकी रचनायें आपके दिल का अनुवाद है या नहीं ?

कहीं दिमागी गुणा भाग ही न हो

शब्दों से अर्थ कमाने की

एक नितांत बाहरी कोशिश मात्र

 

मन डरता है , मिलने से

ख़्वाब के टूट जाने की आशंकाओं से

क्या आप सच में वैसे ही हैं

जैसी आपकी रचनायें  ? ॥

**********************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 29, 2015 at 9:13pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी भाई साहब, क्या कहने, इस प्रस्तुति की खूबसूरती इसमें खो जाने को विवश करती है, मुझे यह अतुकांत कविता बहुत ही अच्छी लगी, बहुत बहुत बधाई.

इस कविता पर बहुत दिनों बाद नादिर भाई को देखना सुखद लगा.

Comment by Hari Prakash Dubey on January 29, 2015 at 5:35pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी सर, इस सुन्दर रचना पर हार्दिक बधाई , सादर !

Comment by नादिर ख़ान on January 29, 2015 at 4:15pm

मन डरता भी है

कभी कभी

सोचने लगता है  

आपकी रचनायें आपके दिल का अनुवाद है या नहीं ?

कहीं दिमागी गुणा भाग ही न हो

शब्दों से अर्थ कमाने की

एक नितांत बाहरी कोशिश मात्र...........

आदरणीय गिरिराज जी बहुत खूब कहा ..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 29, 2015 at 2:53pm

आदरणीय विजय भाई , आपका बहुत आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 29, 2015 at 2:53pm

आदरणीय बड़े भाई , आपकी स्नेहिल सराहना के लिये आपका हृदय से आभारी हूँ ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 29, 2015 at 2:52pm

आदरणीय जितेन्द्र भाई आपका बहुत शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 29, 2015 at 2:51pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका बहुत आभार ।

Comment by vijay on January 29, 2015 at 2:34pm
एक अच्छी अतुकांत
बधाई
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 29, 2015 at 12:31pm

मन डरता है , मिलने से

ख़्वाब के टूट जाने की आशंकाओं से

क्या आप सच में वैसे ही हैं

जैसी आपकी रचनायें -----------------क्या बात है  i मित्र आप दौड़ नहीउड़ रहे  है i  मार्मिक रचना i

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 29, 2015 at 12:20pm

अंतर्द्वंद का बहुत सुंदर चित्र उकेरा है,सर आपने. आपकी अतुकांत बहुत गहरे चिंतन-मनन से उपजी है. बहुत बहुत बधाई आदरणीय गिरिराज जी

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