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vijay
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Gender
Male
City State
delhi
Native Place
Delhi
Profession
security system dealer

Vijay's Blog

मुस्कुराते हो बहुत पछताओगे

मुस्कुराते हो बहुत पछताओगे
बज़्म से तुम भी निकाले जाओगे


तुम विसाले यार को बेताब हो
उस से मिल कर भी बहुत पछताओगे


साथ तेरा मिलगया मगरूर हूँ
तुम भला क्यों गीत मेरे गाओगे


रूह को माँ बाप की तस्लीम कर
साथ अपने सब उजाले पाओगे


भूख से बच्चा बिलखता हो अगर
किस तरहा से रोटियां खा पाओगे


बात सच्ची कह रहे हो तुम मनु
इस जुबा पर तुम भी छाले पाओगे
.
मौलिक एवं अप्रकाशित
विजय कुमार मनु

Posted on February 1, 2015 at 8:00am — 7 Comments

माँ तू सुनती क्यों नहीं

माँ तू सुनती क्यों नहीं

तूँ बुनती क्यों नहीं

इक नई सी जिंदगी

वो घुटनों पे चलना

वो आँखों को मलना

वो मिटटी को खाना

बिना सुर के गाना

वो चिल्ला के कहना

मुझे रोटी देना

आज फिर चूल्हे पे पानी

तूँ पकाती क्यों नहीं

माँ तूँ सुनती क्यूँ नहीं

वो तेरी हथेली

में कितनी पहेली

वो मेरा कसकना

वो तेरा सिसकना

वो ममता की छाया

मुझे याद आया

वो मुस्कान तेरी

वो पेशानी मेरी

आज फिर से बोशा

सजाती क्यूँ नहीं

माँ…

Continue

Posted on January 30, 2015 at 7:30pm — 12 Comments

जिंदगी

हाथ से यूँ सरसराती सी निकाली जिंदगी
खूब कोशिश की मगर कैसे संभाली जिंदगी


लाख पटके पांव फिर भी जो लिखा था वो हुआ
हर तजुर्बे कर के देखे और खंगाली जिंदगी


जिंदगी की राह में चलते हुए ऐसा लगा
है मरासिम कुछ पुराना देखी भाली जिंदगी


है बड़ी बेबाक सी उज्जड गवारों सी लगी
अब मुझे कितना कचोटे एक गाली जिंदगी

.
मौलिक एवं अप्रकाशित
विजय कुमार मनु

Posted on January 28, 2015 at 9:30am — 11 Comments

एक ग़ज़ल

जिंदगी रेत की मानिंद सरक जाती है

ये मेरी जीस्त हरेक गाम लरज जाती है

तू खफा है तो हुआ कर या रब

सामने मेरे फकत माँ ही काम आती है

ये हुस्न ये शबाब ये नामो शौकत

तूँ बता बाद में मरने के किधर जाती है

मेरी किस्मत है जैसे आंधियो में रेत के घर

जब चमकती है सरे राह बिखर जाती है

यूँ हुआ बेवफा मुझी से जहाँ

याद करता हूँ वफ़ा आँख बरस जाती है

अब मेरा दिल है मेरी जां है और बस मैं हूँ

उसको देखूं कभी ये रूह तरस जाती है

अब तो घर चल बहुत ही रात हुई अब तो… Continue

Posted on January 26, 2015 at 10:53pm — 12 Comments

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At 10:51pm on January 26, 2015, vijay said…
जिंदगी रेत की मानिंद सरक जाती है
ये मेरी जीस्त हरेक गाम लरज जाती है
तू खफा है तो हुआ कर या रब
सामने मेरे फकत माँ ही काम आती है
ये हुस्न ये शबाब ये नामो शौकत
तूँ बता बाद में मरने के किधर जाती है
मेरी किस्मत है जैसे आंधियो में रेत के घर
जब चमकती है सरे राह बिखर जाती है
यूँ हुआ बेवफा मुझी से जहाँ
याद करता हूँ वफ़ा आँख बरस जाती है
अब मेरा दिल है मेरी जां है और बस मैं हूँ
उसको देखूं कभी ये रूह तरस जाती है
अब तो घर चल बहुत ही रात हुई अब तो मनुु
दूर होता हूँ तभी घर की भी याद आती है
मौलिक एवम अप्रकाशित
विजय कुमार "मनु"
At 10:04am on January 10, 2015, vijay said…
जान न ले मेरी आँखों से मेरे मन की बात कोई
सो मई आँखे बंद किये बैठा रहता हूँ रातों में
मेरी बातें सुन कर के अंदाज बदल ही जाये ना
सो मैं हँस कर टाल रहा अंदाज बदलकर बातों में
जब भी मिलना दूरी रखना सारी दुनियादारी से
शहर का हर इक शख्श मिलेगा लेकर खंजर हाथो में
एक सी धड़कन तेरे दिल में एक जवाँ दिल मुझमे भी
आ कर ले कुछ प्यार की बातें क्या रक्खा है घातों में
 
 
 

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