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Vijay's Blog (4)

मुस्कुराते हो बहुत पछताओगे

मुस्कुराते हो बहुत पछताओगे
बज़्म से तुम भी निकाले जाओगे


तुम विसाले यार को बेताब हो
उस से मिल कर भी बहुत पछताओगे


साथ तेरा मिलगया मगरूर हूँ
तुम भला क्यों गीत मेरे गाओगे


रूह को माँ बाप की तस्लीम कर
साथ अपने सब उजाले पाओगे


भूख से बच्चा बिलखता हो अगर
किस तरहा से रोटियां खा पाओगे


बात सच्ची कह रहे हो तुम मनु
इस जुबा पर तुम भी छाले पाओगे
.
मौलिक एवं अप्रकाशित
विजय कुमार मनु

Added by vijay on February 1, 2015 at 8:00am — 7 Comments

माँ तू सुनती क्यों नहीं

माँ तू सुनती क्यों नहीं

तूँ बुनती क्यों नहीं

इक नई सी जिंदगी

वो घुटनों पे चलना

वो आँखों को मलना

वो मिटटी को खाना

बिना सुर के गाना

वो चिल्ला के कहना

मुझे रोटी देना

आज फिर चूल्हे पे पानी

तूँ पकाती क्यों नहीं

माँ तूँ सुनती क्यूँ नहीं

वो तेरी हथेली

में कितनी पहेली

वो मेरा कसकना

वो तेरा सिसकना

वो ममता की छाया

मुझे याद आया

वो मुस्कान तेरी

वो पेशानी मेरी

आज फिर से बोशा

सजाती क्यूँ नहीं

माँ…

Continue

Added by vijay on January 30, 2015 at 7:30pm — 12 Comments

जिंदगी

हाथ से यूँ सरसराती सी निकाली जिंदगी
खूब कोशिश की मगर कैसे संभाली जिंदगी


लाख पटके पांव फिर भी जो लिखा था वो हुआ
हर तजुर्बे कर के देखे और खंगाली जिंदगी


जिंदगी की राह में चलते हुए ऐसा लगा
है मरासिम कुछ पुराना देखी भाली जिंदगी


है बड़ी बेबाक सी उज्जड गवारों सी लगी
अब मुझे कितना कचोटे एक गाली जिंदगी

.
मौलिक एवं अप्रकाशित
विजय कुमार मनु

Added by vijay on January 28, 2015 at 9:30am — 11 Comments

एक ग़ज़ल

जिंदगी रेत की मानिंद सरक जाती है

ये मेरी जीस्त हरेक गाम लरज जाती है

तू खफा है तो हुआ कर या रब

सामने मेरे फकत माँ ही काम आती है

ये हुस्न ये शबाब ये नामो शौकत

तूँ बता बाद में मरने के किधर जाती है

मेरी किस्मत है जैसे आंधियो में रेत के घर

जब चमकती है सरे राह बिखर जाती है

यूँ हुआ बेवफा मुझी से जहाँ

याद करता हूँ वफ़ा आँख बरस जाती है

अब मेरा दिल है मेरी जां है और बस मैं हूँ

उसको देखूं कभी ये रूह तरस जाती है

अब तो घर चल बहुत ही रात हुई अब तो… Continue

Added by vijay on January 26, 2015 at 10:53pm — 12 Comments

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