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हाथ से यूँ सरसराती सी निकाली जिंदगी
खूब कोशिश की मगर कैसे संभाली जिंदगी


लाख पटके पांव फिर भी जो लिखा था वो हुआ
हर तजुर्बे कर के देखे और खंगाली जिंदगी


जिंदगी की राह में चलते हुए ऐसा लगा
है मरासिम कुछ पुराना देखी भाली जिंदगी


है बड़ी बेबाक सी उज्जड गवारों सी लगी
अब मुझे कितना कचोटे एक गाली जिंदगी

.
मौलिक एवं अप्रकाशित
विजय कुमार मनु

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 1, 2015 at 11:57am

लाख पटके पांव फिर भी जो लिखा था वो हुआ
हर तजुर्बे कर के देखे और खंगाली जिंदगी ------ लाजवाब बात कही , आदरणीय विजय भाई , बधाई ॥

Comment by ram shiromani pathak on February 1, 2015 at 10:07am
बहुत प्यारी ग़ज़ल आदरणीय।।हार्दिक बधाई
भाई मिथिलेश जी से सहमत हूँ।।सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on February 1, 2015 at 9:59am

बहुत बढ़िया आदरणीय विजयजी बहुत बहुत बधाई आपको।

मैं भी मिथिलेश जी से सहमत हूँ :-)

Comment by somesh kumar on January 30, 2015 at 11:36am

ज़िन्दगी गाली की तरह कचोटे यह बात नागवार लगी |गज़ल अच्छी पर इसमें लहजा पूरी तरह शिकायती क्यों ?

Comment by vijay on January 29, 2015 at 8:12am
मिथलेश जी आभार आपकी बेशकीमती राय के लिए

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 29, 2015 at 12:13am

बढ़िया अशआर ... सभी बह्र में है.... सिर्फ एक शेर और कह दे तो ग़ज़ल मुकम्मल हो जाए. अरुज के अनुसार ग़ज़ल में कम से कम पांच अशआर होने चाहिए. हरेक शेर में बह्र-ए-रमल के अरकान फाइलातुन-फाइलातुन-फाइलातुन-फाइलुन को क्या खूब निभाया है लगता है आदरणीय विजय जी आप बह्र को खूब जानते है. लग रहा है जैसे पिछली रचना, ग़ज़ल के नाम से  हमारी परीक्षा लेने के लिए पोस्ट की गई थी. भाई बहुत खूब. बधाई स्वीकार करे और में शेर-दर-शेर दिल से दाद कुबूल कीजिये. 

Comment by vijay on January 28, 2015 at 10:43pm
आभार सभी गुनीजनो का
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 28, 2015 at 9:57pm

बढ़िया गजल i

Comment by Hari Prakash Dubey on January 28, 2015 at 8:15pm

आदरणीय विजय कुमार जी सुन्दर रचना हार्दिक बधाई ! सादर  

Comment by Sushil Sarna on January 28, 2015 at 7:53pm

ज़िंदगी के दर्दीले पक्ष को दर्शाती सुंदर ग़ज़ल आदरणीय  … हार्दिक बधाई 

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