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कविता मत लिखो (अतुकान्त) // --सौरभ

आप कविता लिखते हैं ? .. कौन बोला लिखने को..?
शब्द पीट-पीट के अलाय-बलाय करने को ?
मारे दिमाग़ खराब किये हैं ?

कुच्छ नहीं बदलता.. कुच्च्छ नहीं. ..
इतिहास पढ़े हैं ?
क्या बदला आजतक ? ...
खलसा कलेवर !
केवल ढंग !
महज़ अंदाज़ !
बकिया सब ?.. .

जो ढेरम्ढेर लिख-लिख पूछते फिरियेगा न, तो बुद्धिजीवी नहीं
सीधा ’नकसल्ली’ कहलाइयेगा..  एक नम्मर का बवाली..
किसी सोये को उकसाना.. मालूम ? घोर हिंसा को बढ़ावा देना है !
पता है.. ? 

जाइये, बोल-बचन बनाइये,
शब्द गढ़िये, मात्रा गिनिये, पंक्तियों में गठन लाइये..
छन्द निभाइये..  आ मस्त रहिये !
गाँव-समाज-दुख-व्याधि-मानवता.. ऐसी की तैसी..
एक पूरा समाज भहराया पड़ा है.. त्रस्त.. लाल-लाल आँखें लिये.
ऐसे समाज के कुनबों को कुचलना

प्रशासन को सहयोग देना होता है / हमेशा से !
सभी प्रशासन को सहयोग दें.. देना ही चाहिये..
तभी दिन अच्छे आ पायेंगे.

विशिष्ट जमात में अपनी आमद की रौनक बजती है..
जाइये, आप भी रौनक बजाइये..

कापुरुषत्व अब सधे पौरुष का पर्याय है.
और साहित्य का संधान  -- हाशिये पर पड़े.. नहीं-नहीं.. .
मुँहचोर हुआ करते हैं अब !

***************
-सौरभ
***************
(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by Sushil Sarna on January 8, 2015 at 12:36pm

अपने तीक्षण भावों से अंतर्मन तक घाव करती प्रस्तुत रचना वर्तमान का आईना है। आज किसके पास फुर्सत है जो शब्दों के मर्म से युग परिवर्तन के बारे में सोचे।  इस गहन भावों को अभिव्यक्त करती रचना की प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत बधाई आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 8, 2015 at 11:43am

आदरणीय भाई सौरभ जी ,दिमाग सुन्न कर दिया और दिल के पट्टर खोल दिए , हार्दिक बधाई .

Comment by Shyam Narain Verma on January 8, 2015 at 11:32am

आपकी इस सुंदर प्रस्तुति पर सादर बधाई

Comment by Dr. Vijai Shanker on January 8, 2015 at 11:23am
परिवर्तन के नाम पर हम दो कदम आगे बढ़ते हैं , अगले पल चार कदम पीछे लौट लेते हैं , बात हवा में , खयालात सत्रहवीं शताब्दी के , आधुनिकता के सारे भोग चाहिए , कीमत चाहे कुछ भी हो, बड़े हैं, अमीर हैं, हर लक्जरी खरीद सकते हैं, आधुनिक सुख सुविधाओं से लैस, विचार छोड़ हर तरह से आधुनिक दिखने चाहिए। मानसिकता वही पुरानी , प्राचीन , नहीं तो मध्य - युगीन। इसी लिए बदला हुआ लगता है, बदलता कुछ नहीं।
आपकी प्रस्तुति कितने बिन्दुओं को समेटे हुए है,
" एक भहराया हुआ पूरा समाज " कौन सोचता है उनके बारे में, उस जहां में जहां
कापुरुषत्व अब सधे पौरुष का पर्याय है.
और साहित्य का संधान -- मुँहचोर हुआ करते हैं अब,
फिर भी जाने क्यों लगता है , कुछ लिखे हुए से ही कुछ बदल सकेगा , डर भी है क्योंकि वैसे ही कम नहीं लिखा गया है यहां , जो लिखा गया है वह पता नहीं पढ़ा किसने , जीवन में तो नहीं ही दिखाई पड़ता है.
आपको आपकी इस तेजस्वी रचना के लिए अनेकानेक बधाइयां आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी , सादर।
पुनश्चय: , आपकी एक पंक्ति ने कुछ लिखने को प्रेरित किया है , उसको लेते हुए कुछ लिखूं शायद , बशर्ते आपकी अनुमति हो।
Comment by Hari Prakash Dubey on January 8, 2015 at 10:11am

आदरणीय सौरभ पाण्डेय सर ,क्या गज़ब की रचना है ..इतिहास पढ़े हैं ? क्या बदला आजतक ? ...सीधा ’नकसल्ली’ कहलाइयेगा...जाइये, आप भी रौनक बजाइये..मुँहचोर हुआ करते हैं अब !........ अतुलनीय, वर्तमान व्यवस्था पर चोट करती सार्थक कविता , एक ही बार में , मुक्तिबोध,शमशेर,सहाय, डंगवाल  सभी याद आते हैं ...पर ये सौरभ पाण्डेय जी  का अपना तरीका... कोई तुलना नहीं ... हार्दिक बधाई आपको ! सादर 

Comment by Anurag Prateek on January 8, 2015 at 7:02am

झकझोर कर रख दिया अपने आदरणीय – वाह 

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