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ग़ज़ल -- मुहब्बत का तराना तो बहुत गाया हुआ है ( गिरिराज भंडारी )

मुहब्बत का तराना तो बहुत गाया हुआ है

**************************************

1222    1222    1222     122 

न आये होश अब यारों नशा छाया हुआ है  

सँभल ऐ बज़्म दिल अब वज़्द में आया हुआ है

 

ज़रा राहत की कुछ सांसें तो लेलूँ मैं ,कि सदियों

बबूलों को मनाया हूँ तो अब साया हुआ है 

 

हथौड़ा एक तुम भी मार दो लोहा गरम पर

यहाँ मज़हब को ले के खून गरमाया हुआ है

 

अँधेरा बांट के भी रोशनी का मुंतज़िम , वो

तुम्हें किसने कहा, ग़मगीन, शर्माया हुआ है ?

 

सुना है आइनों की बस्ती में फिर कोई पत्थर

वहाँ की तेवरी से खूब घबराया हुआ है

 

कि अब सरकश तराने का कोई आगाज़ भी हो 

मुहब्बत का तराना तो बहुत गाया हुआ है

 

मुझे बज़्मे तरब की रोशनी में मत घसीटो

मेरे अन्दर का सन्नाटा मुझे भाया हुआ है

******************************************** 

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

Views: 747

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 24, 2014 at 5:43am

आदरणीय मुकेश भाई , सराहना और उत्साह वर्धन के लिये आपका दिली  आभार ।

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on November 21, 2014 at 10:16am

bahut khoob mitra


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 20, 2014 at 11:50pm

आदरणीय हरि प्रकाश भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका दिली शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 20, 2014 at 11:49pm

आ. गुमनाम भाई , आपका आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 20, 2014 at 11:48pm

आदरणीय सुशील सरना भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 20, 2014 at 11:47pm

आदरणीय विजय भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका दिली शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 20, 2014 at 11:46pm

आदरणीया राजेश जी , गज़ल की सराहना और सलाह के लिये आपका हार्दिक आभार ।

Comment by Hari Prakash Dubey on November 20, 2014 at 5:14pm

मेरे अन्दर का सन्नाटा मुझे भाया हुआ है...बहुत खूब , हार्दिक बधाई आदरणीय श्री गिरिराज भंडारी जी 

Comment by gumnaam pithoragarhi on November 19, 2014 at 8:02pm

बहुत खूब................

Comment by Sushil Sarna on November 19, 2014 at 7:45pm

वाह आदरणीय गिरिराज जी बहुत ही सुंदर ग़ज़ल जिसका हर शे'र अपनी महक से ग़ज़ल में छाया हुआ है ....
मुझे बज़्मे तरब की रोशनी में मत घसीटो
मेरे अन्दर का सन्नाटा मुझे भाया हुआ है … मज़ा आ गया सर … इस प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय।

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