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सबकुछ जाने सबकुछ समझे  

पागल ये फिर भी धुन है

औचक टूट गए सपनों की

उचटी आँखों की धुन है |

 

इस धुन की ना जीभ सलामत

ना इस धुन के होठ सलामत   

लँगड़े, बहरे, अंधे मन की  

व्याकुल ये कैसी धुन है |  

 

खेल-खिलौने टूटे-फूटे   

भरे पोटली चिथड़े-पुथड़े

अत्तल-पत्तल बाँह दबाए

खोले-बाँधे की धुन है |

 

क्या खोया-पाना, ना पाना  

अता-पता न कोई ठिकाना

भरे शहर की अटरी-पटरी  

पर गिरती-पड़ती धुन है |

 

फूटा लोटा, टूटी डोरी  

भठे कुएँ पर खड़ा बटोही

बेसुध कंकड़-पत्थर भरती   

ये कैसी प्यासी धुन है |

 

किए-धरे का लेखा-जोखा

झाड़ों ने कब तौला-देखा  

काँटों में घायल पंखों की  

ज्यों फड़फड़ करती धुन है |

 

ऐसा होता, वैसा होता   

तो आज समय कैसा होता   

बीती बातों को धुनने की

बेमतलब गुनती धुन है |

 

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

-- संतलाल करुण       

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 4, 2014 at 4:43am

कथ्य के भाव चिर सत्य को समेटे हुए निर्गुनिया शैली में मुखर हैं आदरणीय. इन इंगितों में जो सनातन आश्वस्ति है उसके अनुसार अनुभूति का ही महत्व हुआ करता है, तार्किकता का कोई स्थान नहीं है. इसी भावभूमि के संबल पर शताब्दियों से भूमिपूत्र दुर्धर्ष परिस्थितियों में भी ठहाके लगाते जी जाया करते थे. नैराश्य को नकारते हुए जीने की ताकत हुआ करती थी यह भावभूमि. आज प्रासंगिक हो गये कई तथाकथित विन्दुओं के कारण नैराश्य हावी हो चला है. इस परिप्रेक्ष्य में आपका यह गीत ठंढी हवा के झोंके की तरह आया है. हार्दिक बधाई..

शिल्प के स्तर पर आदरणीय  तनिकऔर ध्यान दिया जाना बनता था. इस पहलू पर आप अवश्य संवेदनशील होंगे, विश्वास है.

’भाव प्रस्तुतीकरण आवश्यक है, न कि क्लिष्ट प्रतीत होता काव्य-शिल्प’  आदि जैसी अति उत्साही उद्घषणाओं की निर्मूलता को आपका विवेकी मन अवश्य समझता होगा, आदरणीय.

शुभ-शुभ

.

Comment by mrs manjari pandey on September 2, 2014 at 10:57pm
आदरणीय सर धुन की बहुत सुन्दर व्याख्या आपने की. धुन को बस धुनते जाने गुनते जाने का जी होता है. बहुत ही सुन्दर रचना मई भी काफी समय बाद ओबीओ खोल सकी हूँ।
Comment by Shyam Narain Verma on September 2, 2014 at 11:11am
" सुन्दर भाव पूर्ण रचना के लिये आपको बधाइयाँ .................. "
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 2, 2014 at 10:06am

धुन शायद होती ही ऐसी है, कहीं कोई परवाह नही. बहुत सुंदर, बधाई आपको आदरणीय संतलाल जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 2, 2014 at 9:56am

बहुत सुन्दर मनमुग्ध करता गीत ...बहुत बहुत बधाई आपको आ० संतलाल करुण जी 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on September 1, 2014 at 9:14pm

आदरणीय श्री संतलाल जी, आपकी कविता के साथ श्री गोपाल नारायण की छोटी कविता भी सुन्दर लगी!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 1, 2014 at 6:45pm

करुण जी

धुन ही होती है  धुन जैसी

धुन में बेसुध  तन मन है I

धुन की धुन मे सब मतवाले   

धुन ही कवि का जीवन है II

 

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