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“बेटा..! ऐसा मत कर, फेंक दे ये ज़हर की बोतल I ले हमने जमीन के कागज़ पर दस्तख़त कर दिए हैं. जा, अब मर्ज़ी इसे बेच या रख। बस अपनी पत्नी और बच्चों के साथ ख़ुशी से रह । हमारा क्या है बेटा, हम कुछ दिन के मेहमान हैं,जी लेंगे जैसे-तैसे...” माँ रुंधे हुए गले से कहा.

सभी निगाहें बेटे पर केंद्रित थीं जो जहर की बोतल को आँगन में ही फेंक दस्तखत किये हुए कागजों को  समेटने में व्यस्त था. लेकिन उसी बोतल को उठाकर अपनी कोठरी में ले जाते बापू पर किसी की भी नज़र नही पडी थी.

    जितेन्द्र 'गीत

(मौलिक व् अप्रकाशित)'

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Comment by बृजेश नीरज on July 12, 2014 at 7:31am
बहुत ही सुन्दर लघुकथा। आपको हार्दिक बधाई।
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 12, 2014 at 6:09am
आदरणीय जीतेन्द्र गीत जी , सुन्दर रचना के लिए बहुत बहुत बधाई। विवशता दोनों पक्षों में है , क्या करियेगा .
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 12, 2014 at 12:24am

आपकी विस्तृत प्रतिक्रिया से मुझे अति मनोबल मिला आदरणीय रवि जी, आप अपना स्नेह व् मार्गदर्शन बनाये रखियेगा

सादर!


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on July 11, 2014 at 9:53pm

बापू बोतल उठा कर कोठरी में क्यों चला गया, यही प्रश्नचिन्ह इस लघुकथा की सुंदरता है भाई शुभ्रांशु जी.

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on July 11, 2014 at 9:30pm

आदरणीय जितेन्द्र जी

सुंदर कथा की बधाई जो अंत में  एक रहस्य छोड़ जाती है।

Comment by Pragya Srivastava on July 11, 2014 at 8:22pm
आदरणीय जितेन्द्र जी,
बहुत ही मर्मस्पर्शी लघु कथा
बधाई आपको
Comment by विनय कुमार on July 11, 2014 at 8:20pm

बहुत बेहतरीन लघुकथा , बधाई स्वीकारें जीतेंद्रजी ..

Comment by Shubhranshu Pandey on July 11, 2014 at 8:09pm

आदरणीय जितेन्द्र जी,

सुन्दर कथा. पिता की एक हरकत ने कथा को चरम् बिन्दु पर पहुचाया है और कथा समाप्त हो जाती है. पाठक अब अपने हिसाब से समझे कि पिता ने वो जहर की बोतल एक समस्या के समाधान होने पर हटाया या पुत्र की हठधर्मिता के प्रतिकार में इस्तमाल करने के लिये हटाया है...

बधाई.

सादर.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 11, 2014 at 7:52pm

सन्न करती लघु कथा अंत में ह्रदय पर आघात करती है ,यही इस लघु कथा को विशेष और सार्थक बनाती है बस इससे अधिक कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूँ .....इस सफल प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई. 

Comment by Ravi Prabhakar on July 11, 2014 at 1:09pm

प्रिय मित्रवर,
    एक सफल लघुकथा तीव्र गति से चलती हुई शिखर पर पहुंच कर एकदम समाप्त हो जाती है। यह विधा चयनशील अनुभव को तीक्ष्णता, तीव्रता और सूक्ष्मता से कहने की विधि के कारण ही लघु है। लघुकथा के प्रभाव की एकता, एकाग्रता और तीक्ष्णता के लिए रचना का आकार छोटा होना भी अति आवश्यक है। यह सभी गुण आपकी प्रस्तुत लघुकथा में दिखाई दिए। एक सफल प्रस्तुति के लिए हृदय से शुभकामनाएं।

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