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ग़ज़ल -चाँद छुपकर अँधेरों में रोता रहा

212      212    212     212

रात जगता रहा दिन में सोता रहा

चाँद के ही  सरीखे से होता रहा

 

बादलों की हुकूमत हुई चाँद पर

चाँद छुपकर अँधेरों में रोता रहा

 

उल्टे रस्ते ही जब मुझको भाने लगे

बारी बारी से अपनों को खोता रहा

 

रस्म मैंने निभायी नहीं है मगर

दिल में रिश्तों को अपने संजोता रहा

 

जो न मांगा मिला मुझको सौगात में

जिसको चाहा वो मुश्किल से होता रहा

 

मैंने अपने गले से लगाया जिसे

पीठ पर वो ही खंजर चुभोता रहा

 

अमित कुमार दुबे मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by वेदिका on July 22, 2014 at 6:11pm
बढ़िया प्रयास हुआ है। चर्चाएँ अमल करने योग्य हुयी है। आ0 राजेश दीदी आ0 निलेश जी ने सार्थक सुझाव दिए है। अच्छी बात कि आप उन्हें अपना भी चुके है।
मेरी तरफ से हार्दिक बधाई आ0 वागर्थ जी!
Comment by अमित वागर्थ on July 22, 2014 at 4:15pm

जी सौरभ सर कोशिस करूंगा की आवृति बढ़ा सकूँ ... सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 22, 2014 at 4:09pm

अपने विस्मरण का हार्दिक खेद है भाईजी.

फिर तो आप प्रस्तुतियों की आवृति बढ़ा दें .. :-))

शुभ-शुभ

Comment by अमित वागर्थ on July 22, 2014 at 4:02pm

आदरणीय सौरभ सर आपकी उपस्थिति मेरे लिए गर्व का विषय है । इसके पहले भी आप मेरी कुछ ग़ज़लों पर आ चुके हैं। आगे भी स्नेह बनाए रखिए ... प्रस्तुतियों को भी आपका इंतज़ार रहेगा । ग़ज़ल पर आने के लिए आपका सादर धन्यवाद ।

Comment by अमित वागर्थ on July 22, 2014 at 3:57pm

बहुत बहुत धन्यवाद आ0 vijay nikore जी

Comment by अमित वागर्थ on July 22, 2014 at 3:56pm

बहुत शुक्रिया आ0 जितेंद्र जी

Comment by अमित वागर्थ on July 22, 2014 at 3:55pm

शुक्रिया आ0  Sarwesh Kumar Mishra जी

Comment by अमित वागर्थ on July 22, 2014 at 3:55pm

आदरणीय Santlal Karun जी बहुत शुक्रिया आपका

Comment by अमित वागर्थ on July 22, 2014 at 3:54pm

आ0 गिरिराज भंडारी सिर बहुत बहुत धन्यवाद आपका

Comment by अमित वागर्थ on July 22, 2014 at 3:53pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया

कृपया ध्यान दे...

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