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नज़र मुझ पे कर दे ......गज़ल

एक गज़ल 

वज्न- 122 122 122 12

मेरे दिल को तुझसे वफ़ा चाहिए 

न जख्म ए जिगर फिर नया चाहिए 

~

है अरसा हुआ मै हूँ अब भी वहीँ 

तेरे दिल से निकली सदा चाहिए 

~

जो बीमार को कर सके है भला 

किसी हाथ में वो शिफ़ा चाहिए 

~

ये हैं इन्तेज़ामात तेरे ख़ुदा 

है किसने कहा इब्तिला* चाहिए                               दुःख 

~

जो दिल हैं परेशां जफ़ा से यहाँ 

महज़ उनके खातिर दुआ चाहिए 

~

अजी संगदिल है वो मेरा सनम 

नज़र मुझपे कर दे तो क्या चाहिए 

~

~वेदिका                           

[मौलिक/ अप्रकाशित] 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 15, 2014 at 6:52pm

आपकी ग़ज़ल को पढ़ा आदरणीया गीतिकाजी. इस कोशिश के लिए हार्दिक बधाई.

Comment by वेदिका on July 13, 2014 at 3:21pm
आभार आदरणीय नीलेश जी! आपने वांछित सुधार हेतु ध्यान आकर्षित कराया।
Comment by Sushil Sarna on July 9, 2014 at 7:15pm

जो दिल हैं परेशां जफ़ा से यहाँ
लिए उनके केवल दुआ चाहिए .... वाह वाह वाह बहुत खूब आदरणीया वेदिका जी … दिलकश अहसासों से लबरेज़ इस ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 9, 2014 at 6:08pm

प्रिय गीतिका, ऊपर बह्र लिखने से पढने वालों को व् समीक्षा करने वालों को सहूलियत रहती है|बाकि जो कहना चाहती थी सुधी जां पहले ही कह चुके थोड़े से सुधार से उम्दा ग़ज़ल निखर कर आएगी अंतिम शेर तो कमाल का है ...बहुत बधाई आपको प्रयास रत रहिये शुभकामनाएँ |

Comment by Madan Mohan saxena on July 9, 2014 at 3:48pm

अजी संगदिल है वो मेरा सनम
नज़र मुझपे कर दे तो क्या चाहिए

बहुत सुन्दर गजल ,हार्दिक बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 9, 2014 at 10:23am

आदरनीया वेदिका जी , खूब सूरत ग़ज़ल कही है , आपको मेरी दिली बधाइयाँ ॥ आ. नीलेश भाई जी से सहमत हूँ , बह्र मे भी होते हुये -

लिए उनके केवल दुआ चाहिए - शब्द संयोजन खटक रहा है -- चाहें तो आप ऐसा भी कह सकते हैं -- महज़ उनकी खातिर दुआ चाहिये ॥

अगर कुछ ग़लत कहा हो तो क्षमा करें ॥

Comment by savitamishra on July 8, 2014 at 11:17pm

bahut badhiya 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 8, 2014 at 8:20pm

अजी संगदिल है वो मेरा सनम 

नज़र मुझपे कर दे तो क्या चाहिए 

वाह क्या बात है आदरणीया वेदिका जी बहुत खूब कहा

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 8, 2014 at 3:28pm

वेदिका जी

गजल के साथ ही  आखीरी शेर को सलाम  i  सादर i

Comment by Nilesh Shevgaonkar on July 8, 2014 at 2:48pm

बहुत ख़ूब ..सुन्दर ग़ज़ल हुई है ..
ज़ख्मो जिगर शायद टाइपिंग एरर है ..ज़ख्मे जिगर होगा ..
.
लिए उनके केवल दुआ चाहिए ...इस मिसरे में वाक्य रचना थोड़ी इधर उधर लग रही है ..बाक़ी वरिष्ठ जन जैसा कहें 
सादर 

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