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झुकी उस डाल में हमको कई चीखें सुनाई दें (ग़ज़ल 'राज')

१२२२  १२२२   १२२२   १२२२ 

तुम्हारे पाँव से कुचले हुए गुंचे दुहाई दें

फ़सुर्दा घास की आहें हमें अक्सर सुनाई दें

 

तुम्हें उस झोंपड़ी में हुस्न का बाज़ार दिखता है

हमें फिरती हुई बेजान सी लाशें दिखाई दें

 

तुम्हें क्या फ़र्क पड़ता है मजे से तोड़ते कलियाँ

झुकी उस डाल में  हमको कई चीखें सुनाई दें

 

न कोई दर्द होता है लहू को देख कर तुमको  

तुम्हें आती हँसी जब सिसकियाँ  भर- भर दुहाई दें 

कहाँ महफ़ूज़ वो माँ दूध से जिसने हमे पाला

झुका देती जबीं अपनी सजाएँ जब कसाई दें

 

उड़े कैसे भला तितली लगे हैं घात में शातिर

खुदा की रहमतें ही बस उन्हें अब तो रिहाई दें 

 

करें फ़रियाद कब किससे जहाँ में कौन है किसका

सितम गर रूहें , खुद रब की अदालत में सफ़ाई दें

 

फ़सुर्दा =मुरझाई हुई

महफ़ूज़ =सुरक्षित

जबीं =माथा 

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by विनय कुमार on July 10, 2014 at 2:37am

तुम्हें उस झोंपड़ी में हुस्न का बाज़ार है दिखता हमें फिरती हुई बेजान सी लाशें दिखाई दें वाह , बहुत बेहतरीन , दिली बधाई |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 9, 2014 at 5:07pm

आ० मदन मोहन सक्सेना जी ,आपको ग़ज़ल अच्छी लगी मेरा लिखना सफल हुआ ,हार्दिक आभार आपका |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 9, 2014 at 5:06pm

नरेन्द्र सिंह चौहान जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई तहे दिल से शुक्रिया आपका |

Comment by Madan Mohan saxena on July 9, 2014 at 3:54pm

तुम्हें उस झोंपड़ी में हुस्न का बाज़ार है दिखता
हमें फिरती हुई बेजान सी लाशें दिखाई दें

तुम्हें क्या फ़र्क पड़ता है मजे से नोंचते कलियाँ
झुकी उस डाल में हमको कई चीखें सुनाई दें
बहुत सुन्दर गजल ,हार्दिक बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 9, 2014 at 10:20am

शिज्जू भैय्या ग़ज़ल के भाव आपको पसंद आये मेरा लिखना सार्थक हुआ ,तहे दिल से आभारी हूँ |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 8, 2014 at 10:38pm

वाह बेमिसाल ग़ज़ल,  भावनाओं को क्या खूब शेरों की शक्ल में पेश की है आपने बहुत बहुत बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 8, 2014 at 9:48pm

आ० महेश्वरी कनेरी जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ ,तहे दिल से आभारी हूँ |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 8, 2014 at 9:47pm

आ० डॉ आशुतोष जी ,आपको ग़ज़ल उसके भाव प्रभावित कर सके ,मेरा लिखना सार्थक हुआ तहे दिल से आभार आपका |

Comment by Maheshwari Kaneri on July 8, 2014 at 12:45pm

  बहुत बढिया गजल ..राजेश जी..उर्दू का अच्छा प्रयोग किया है..

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 8, 2014 at 11:56am

आदरणीया राजेश जी ..आज तो आपकी ग़ज़ल उर्दू के रंग में रंगी दिखी ..बहुत ही अच्छे भाव..

तुम्हें उस झोंपड़ी में हुस्न का बाज़ार है दिखता

हमें फिरती हुई बेजान सी लाशें दिखाई दें....

करें फ़रियाद कब किससे जहाँ में कौन है किसकाए

सितम गर रूह, खुद रब की अदालत में सफ़ाई दें...ये दो शेर तो मुझे बिशेष रूप से बेहद पसंद आये ...ए a

इस शानदार ग़ज़ल के आपई को हार्दिक बधाई सादर 

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