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इक बार आ उस माँ से मिला दे मुझे ……

इक बार आ उस माँ से मिला दे मुझे ……

वक्त तेरे दामन . को मोतियों से भरूँ
इक बार बीते लम्हों से मिला दे मुझे
थक गया हूँ बहुत ..बिछुड़ के जिससे
इक बार आ उस माँ से मिला दे मुझे

इक बार आ उस माँ से मिला दे मुझे

पंथ के शूलों से हैं रक्त रंजित ये पाँव
नहीं दूर तलक कोई ममता का गाँव
अश्रु अपनी हथेली पे ले लेती थी जो
उस आँचल की छाँव में छुपा दे मुझे

इक बार आ उस माँ से मिला दे मुझे

मेरी अकथ व्यथा को पढ़ लेती  थी  जो
मेरी साँसों में तृप्ति सी भर देती थी  जो
मेरे पाषाण पलों को मोम करती थी जो
हिम  गंगा  सी  वो मूरत  दिखा दे मुझे

इक बार आ उस माँ से मिला दे मुझे


सुशील सरना/
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 7, 2014 at 8:39pm

आदरणीय शुशील जी ..माँ की जीवन में बड़ी महता है उसकी ममता के छाँव में जो सुख मिलता है उसका सुखद अहसास हर जिन्दगी से सदैव जुदा रहता है ,,जिस संजीदगी से आपने यह रचना लिखी है मन गदगद हो गया ...हर पंक्ति अद्भुत है .इसके लिए आप निश्चित रूप से साधुवाद के पात्र हैं ..ढेर सारी बधाई के साथ सादर 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 7, 2014 at 7:04pm

सुन्दर भावाभिवक्ति रचना के लिए हार्दिक बधाई श्री सुशील सरना जी | -

मेरी अकथ व्यथा को पढ़ लेती  थी  जो 
मेरी साँसों में तृप्ति सी भर देती थी  जो 
मेरे पाषाण पलों को मोम करती थी जो 
हिम  गंगा  सी  वो मूरत  दिखा दे मुझे ------माँ के प्रति सुन्दर भाव | वाह 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 7, 2014 at 7:02pm

आ0 सुशील भाईजी,    एक बेहतरीन रचना ।  दिल को प्रभावित करने में सफल है।  हार्दिक बधाई स्वीकारें।  सादर,

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 7, 2014 at 6:19pm

आह सरना जी

मै बचपन से ही मातृ हीन हूँ  i आप समझ सकते है ऐसे गीतों से मेरी क्या हालत होती है i

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 7, 2014 at 5:14pm

आदरणीय आँखें नम हो गईं पढ़कर काश ऐसा पुनः हो गए आपको कोटिशः बधाई माँ को नमन


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 7, 2014 at 3:23pm

आदरणीय सुशील भाई , माँ से मिलने की तड़प साफ उभर के आयी है , बहुत खूब भाई ! बधाई ॥

कृपया ध्यान दे...

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