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अंतःकरण की शुद्धि

अंतःकरण की शुद्धि

सुबह में , शाम में,
वर्षा और घाम में,
जीवन के साम-दाम में,
अंतःकरण की शुद्धि चाहिए,

देवता के पूजन में ,
मन्त्रों के गुंजन में,
सज्जन और दुर्जन में,
अंतःकरण की शुद्धि चाहिए,

राग-वैराग्य में,
स्वार्थ और त्याग में ,
जीवन सौभाग्य में,
अंतःकरण की शुद्धि चाहिए,

दुःख में क्लेश में
किसी भी वेश में ,
दुर्भाग्य और भाग्य में,
अंतःकरण की शुद्धि चाहिए,

डॉ. विजय प्रकाश शर्मा
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 7, 2014 at 9:30am

आ० सौरभ पाण्डेय जी,
अपने इस कमजोर रचना के लिए खेद है परन्तु ख़ुशी इस बात की है की इस कारण ही आपका मार्गदर्शन पाने का अवसर मिला.
आपके बहुमूल्य सुझाव के लिए हार्दिक आभार.कोशिश करूंगा प्रस्तुति दुरुस्त हो. सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 7, 2014 at 12:47am

आपकी कई रचनाओं से गुजरने का सौभाग्य मिला है आदरणीय विजय प्रकाशजी. आपकी छोटी मगर धारदार अभिव्यक्तियाँ सहज ही प्रभावित करती रही हैं. और सच कहूँ तो इसीकारण आपकी रचनाओं का इंतज़ार भी रहता है. उस हिसाब से आपकी अबतक की सबसे कमज़ोर प्रस्तुति से गुजर रहा हूँ. ऐसा नहीं कि इस रचना ने पाठक के तौर पर मेरा ध्यान नहीं खींचा है.

सादर

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 27, 2014 at 8:34am

बहुत-बहुत आभार आ० प्राची जी.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 26, 2014 at 6:44pm

नित्य अन्तः प्रक्षालन ही चित्त की वृत्तियों को नियंत्रित कर मन वचन कर्म बुद्धि अहं को संतुलित रखता है... अन्तः करण की शुद्धि को दरकिनार कर आज व्याप्तता जाता अनैतिक आचरण ही तो सारी समस्याओं का मूल कारण है 

शुद्ध अन्तः करण ही पूरी पारदर्शिता के साथ हर परिस्थिति में हर सत्य को पहचान सकता है

इस प्रस्तुति पर मेरी बधाई स्वीकारिये आ० विजय प्रकाश शर्मा जी 

Comment by vijay nikore on June 23, 2014 at 11:34pm

रचना के भाव सराहनीय हैं। बधाई, आदरणीय विजय जी।

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 23, 2014 at 11:25pm

आ० भाई गिरिराज भंडारी जी,आपके सराहना के शब्द तो रचना को नया आयाम दे डालते हैं.आपका सदैव आभारी.
विजयप्रकाश.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 22, 2014 at 7:29pm

आदरणीय विजय प्रकाश भाई , सत्य वचन , सही सलाह , ये हो जाये तो सब कुछ सँवर जाये । बधाइयाँ ।

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 22, 2014 at 3:58pm

आ ० डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी आप के उदगार इस रचना से उद्वेलित हुए.आपका आभार .

दस्यु को महाकवि में बदल दिया है-मात्र एक घटना ने -यत्क्रौंच मिथुनादेकम्-------
अंगुलिमाल की कथा भी सामने है." मरा" से "राम" में बदलने में वक़्त नहीं लगता.
,

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 22, 2014 at 12:16pm

दुर्जन का अंतःकरण  शुद्ध हो जाये  तो सारा विश्व समरस हो जायेगा  i  काश !

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 22, 2014 at 10:01am

आपका निरंतर मेरे रचनाओं को सराहना मुझे संजीवनी देता है. हार्दिक अभिनन्दन जीतेन्द्र जी.

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