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क्यों घूंघट में है सच?
क्योंकि तुमने प्रयास नहीं किया
कभी इस और ध्यान नहीं दिया.
उलझे रहे जीवन के उहापोह में
परायों के दोष अपनों के मोह में.
अगर तुमने हिम्मत दिखाई होती
कभी अपनी अंतरात्मा जगाई होती.
देखा होता उठाकर तुमने घूंघट,
ख़ुशी भरा होता आँगन खचाखच.

डॉ.विजय प्रकाश शर्मा.
मौलिक और अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 1, 2014 at 11:32am

आदरणीय विजय शर्मा जी,

मेरे कहे को आपने मान दिया और मेरे इंगित पर अपनी बात रखी... इस सहयोग के लिए हार्दिक आभार 

मेरा सिर्फ इतना ही कहना है...की कोइ भी सजग पाठक रचना को शब्दशः ही पढता है और भाव को ग्रहण करने का प्रयास करता है... और जिस पाठक को सरसरी निगाह से बिना चिंतन मनन किये अभिव्यक्तियों से गुज़रना है वो शाब्दिकता की ही वाह वाह कर निकल जाते हैं बिना चिंतन मनन किये...

वैसे आपके सोचने का अपना आधार है जो कुछ हद तक आम पाठक जन की दृष्टि से शायद उचित भी है...

सादर 

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 30, 2014 at 10:12pm

आ० प्राची जी,
पहले मैं आपका अभिनंदन करता हूँ,आपने इतनी बारीकी से रचना को देखा.
वैसे इसे पुन्रक्ति दोष माना जाता है परंतु मेरी सोंच थोड़ी अलग है. किसी महत्वपूर्ण प्रश्न को एक बार पूछने पर पाठक ध्यान ना दे कर अपने रवो में आगे बढ़ जाता है. बात के ख़त्म होने पर अगर प्रश्न को फिर खड़ा कर दिया जाए तो वो थोड़ी देर ठहर कर अवश्य चिंतन करेगा,यही प्रश्न की सार्थकता का क्षण होगा, बस यही समझ इसके पीछे है.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 30, 2014 at 7:45pm

क्यों घूंघट में है सच?

बहुत सार्थक प्रश्न और इसका ज़वाब भी देती सुन्दर सार्थक अभिव्यक्ति..

अंत में पुनः "क्यों घूंघट में है सच?" पंक्ति की पुनरावृत्ति की आवश्यकता मुझे प्रतीत नहीं होती.... क्योंकि यहाँ तक पहुँचते पहुँचते तो प्रश्न उत्तरित हो ही चुका है..... .... आपकी सहमती/असहमति जाना रोचक होगा !

सादर.

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 23, 2014 at 5:00pm

आभार -आ ० महिमा श्री,आ० शकूर जी, आ० सुशील सरन जी एवं आ० जवाहर जी . आप सबों ने सहारा,अहोभाग्य.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on June 23, 2014 at 8:13am

वाह बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति आदरणीय विजय प्रकाश शर्मा सर बहुत बहुत बधाई आपको इस रचना के लिये

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 22, 2014 at 9:23pm

उलझे रहे जीवन के उहापोह में 
परायों के दोष अपनों के मोह में.

अंतर्द्वंद्व को उकेरती सुन्दर रचना , बधाई!

Comment by Sushil Sarna on June 22, 2014 at 8:24pm

अंतर्द्वंद को दर्शाती सुंदर रचना  .... हार्दिक बधाई आदरणीय 

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 22, 2014 at 7:27pm
Respected Vijai Prakash ji ,
Yes sir , that is because of psychic unity of mankind and such incidences confirm it . They confirm that there are others too , who feel the same way , the same pain .
With all my most sincere regards .
Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 22, 2014 at 7:18pm

Dr. Vijai Shanker jee,

Coincidences are due to psychic unity of mankind. Many many thanks for your appreciation.

Comment by MAHIMA SHREE on June 22, 2014 at 6:48pm

बहुत खूब आदरणीय हार्दिक बधाई आपको सादर 

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