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गिड़गिड़ाने से बची कब लाज तेरी द्रोपदी-ग़ज़ल

2122    2122    2122    212

***
शब्द   अबला  तीर  में  अब  नार  ढलना  चाहिए
हर दुशासन का कफन  खुद तू ने  सिलना चाहिए

***
लूटता  हो  जब  तुम्हारी  लाज  कोई  उस समय
अश्क  आँखों   से  नहीं  शोला  निकलना  चाहिए

***
गिड़गिड़ाने   से   बची   कब   लाज  तेरी  द्रोपदी
वक्त पर उसको सबक कुछ ठोस मिलना चाहिए

**
हर समय तो आ नहीं सकता कन्हैया तुझ तलक
काली बन खुद  रक्त  बीजों  को  कुचलना चाहिए

**
फूल बनकर  दे महक  उपवन को  यूँ तो  रोज तू
ज्वाल भी  बन, जो  उठे  वो  हाथ  जलना चाहिए

***
        रचना - 20 मई 2014
     मौलिक और अप्रकाशित
   लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

Views: 999

Comment

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Comment by vijay nikore on June 8, 2014 at 10:29am

इस अच्छी रचना के लिए आपको बधाई, आदरणीय।

Comment by umesh katara on June 8, 2014 at 8:18am

वाहहहहहहहह

Comment by savitamishra on June 7, 2014 at 6:28pm

बहुत सुन्दर

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 7, 2014 at 3:53pm

आदरणीय लक्षमण जी ..इस ग़ज़ल की तो वाकई जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है ..नारी को समर्थवान बनना ही पड़ेगा ,,मेरी तरफ से हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 7, 2014 at 1:54pm

सही कहा आ० लक्ष्मण धामी जी... अब नारी को स्वयं ही इतना सशक्त होना होगा की उसके हाथ अपनी सुरक्षा का जिमा खुद ही उठाने में सक्षम हों..

सभी अशआर पसंद आये बस मतले में आ० शकील जम्शेद्पुरी जी के कहे से मैं भी इत्तेफाक रखती हूँ 

इस सार्थक प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई 

Comment by Meena Pathak on June 7, 2014 at 12:03am

बहुत खूब .. ज्वलंत रचना ... बधाई 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 6, 2014 at 8:32pm

समर्थन! पीड़ित महिलाओं/ लड़कियों को हथियार उठाना ही होगा...

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 6, 2014 at 8:15pm

वाह बहुत खूब ..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on June 6, 2014 at 7:35pm

बहुत बहुत बधाई आदरणीय लक्ष्मण सर

Comment by शकील समर on June 6, 2014 at 3:37pm

गजल अच्छी है। कथ्य के लिए हार्दिक बधाई। शिल्प के बारे में इतना कहूंगा कि मतले में इकवा दोष (हर्फे रवी से पहले लघु स्वर का विरोध) है। 'ढलना' और 'सिलना' को मतले में काफिया नहीं ले सकते।

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