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ग़ज़ल - क्यों शरमाने लगे थे - पूनम शुक्ला

२१२२ / २१२२ / २१२२
दूर से तो गीत वो गाने लगे थे
पास आते ही क्यों शरमाने लगे थे
मेरे दिल में बस गए थे वो उसी दिन
जब से मेरा दिल वो बहलाने लगे थे
दूर थे पर पास ही थीं उनकी यादें
हमने कहा कब आप अनजाने लगे थे
धड़कनों नें खुद ही घुल मिल बात कर ली
तेरे तरन्नुम सारे पहचाने लगे थे
हम हैं तुममें तुम हो हम में अब ये जाना
पर नजारे कब से समझाने लगे थे

मौलिक एवं अप्रकाशित

पूनम शुक्ला

Views: 521

Comment

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 14, 2014 at 1:54pm

आदरणीया पूनम जी .इस शानदार प्रयास के लिए तहे दिल धन्यवाद सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 14, 2014 at 10:22am

आदरणीया पूनम जी , ग़ज़ल का बहुत सुन्दर प्रयास हुआ है , आपको बधाइयाँ ॥

Comment by Shailendra Awasthi "AAKASH" on May 12, 2014 at 5:54pm

बहुत- बहुत बधाई....

Comment by अरुन 'अनन्त' on May 12, 2014 at 2:44pm

अच्छा प्रयास है पूनम जी

Comment by Meena Pathak on May 11, 2014 at 2:21pm

बहुत सुन्दर .. बधाई 

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on May 10, 2014 at 10:37pm

sundar prastuti

Comment by MAHIMA SHREE on May 8, 2014 at 8:51pm

सुंदर प्रस्तुति हार्दिक बधाई आपको/


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 7, 2014 at 9:02pm

//हमने कहा कब आप अनजाने लगे थे

तेरे तरन्नुम सारे पहचाने लगे थे//

आदरणीया पूनम जी कोशिश अच्छी है इन तो मिसरों की फिर से तक्ती करके देखें

Comment by coontee mukerji on May 7, 2014 at 5:55pm

सुंदर रचना...हार्दिक बधाई

Comment by Shyam Narain Verma on May 7, 2014 at 3:02pm
सुन्दर भावों से सजी इस गज़ल के लिए आपको बहुत बधाई।

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