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माँ के हाथों सूखी रोटी का मजा - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122        2122         212

आँसुओं को यूँ  मिलाकर  नीर में

ज्यों  दवा  हो  पी  रहा हूँ  पीर में

**

हाथ की रेखा  मिटाकर चल दिया

क्या लिखा है क्या कहूँ तकदीर में

**

कौन  डरता   जाँ  गवाने  के  लिए

रख जहर जितना हो रखना तीर में

**

हर तरफ उसके  दुशासन डर गया

मैं न था कान्हा  जो बधता चीर में

**

माँ के  हाथों  सूखी  रोटी का मजा

आ  न  पाया  यार  तेरी  खीर में

**

शायरी  कहता  रहा उलझन भरी

शब्द  बध  पाये  नहीं  जंजीर में

******

रचना मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 18, 2014 at 5:16pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई , बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है , आपको दिली बधाइयाँ !!

हाथ की रेखा  मिटाकर चल दिया

क्या लिखा है क्या कहूँ तकदीर में -------- ढेरों दाद इस शे र के लिये !

Comment by coontee mukerji on April 18, 2014 at 1:24am

माँ के  हाथों  सूखी  रोटी का मजा

आ  न  पाया  यार  तेरी  खीर में

**......बहुत सुंदर.

Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on April 17, 2014 at 12:15pm

आदरणीय लक्ष्मण साहेब
बहुत बढ़िया..अच्छी ग़ज़ल..मुबारकबाद

 

हाथ की रेखा  मिटाकर चल दिया

क्या लिखा है क्या कहूँ तकदीर में

शायरी  कहता  रहा उलझन भरी

शब्द  बध  पाये  नहीं  जंजीर में

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 17, 2014 at 11:31am

कौन  डरता   जाँ  गवाने  के  लिए

रख जहर जितना हो रखना तीर में...............शायद इंसान जब  सब कुछ खो देता है, तो किसी से नही डरता 

माँ के  हाथों  सूखी  रोटी का मजा

आ  न  पाया  यार  तेरी  खीर में.............वाह! यह सच  हर कोई समझ  सके

 वास्तविक सच्चाई को गजल के माध्यम से बहुत सुन्दरता से प्रस्तुत किया आपने आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, हार्दिक बधाई आपको

Comment by भुवन निस्तेज on April 17, 2014 at 11:20am

कौन  डरता   जाँ  गवाने  के  लिए

रख जहर जितना हो रखना तीर में

माँ के  हाथों  सूखी  रोटी का मजा

आ  न  पाया  यार  तेरी  खीर में

शायरी  कहता  रहा उलझन भरी

शब्द  बध  पाये  नहीं  जंजीर में

हर शेर स्वयं में एक उपलब्धि है, पढ़कर अनुभूतियाँ झंकृत हो गयीं, आ. लक्ष्मण धमी मुसाफिर साहब बधाई स्वीकार करें,

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