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बदला हुआ नजारा क्यूँ खुद आप सोचिये

२२१२ १२२२ २२१ २१२

वो बज्म में यूं तनहा क्यूँ खुद आप सोचिये

वो मैकदे मैं प्यासा क्यूँ खुद आप सोचिये

 

सूरज फलक पे आता है हर रोज वक़्त पर

फिर भी रहा अँधेरा क्यूँ खुद आप सोचिये

 

बचपन जवान होने से पहले ज़वाँ हुए

है बात इक इशारा क्यूँ खुद आप सोचिये

 

भरपूर तेल बाती भी दमदार थी मगर

किस ने दिया बुझाया क्यूँ खुद आप सोचिये

 

कांधा जो देने आया था हर शख्स गैर था

खुद को ही यूं मिटाया  क्यूँ खुद आप सोचिये

 

पी आग उम्र भर यूं ही जलता रहा हूँ मैं

अपना वदन जलाया क्यूँ खुद आप सोचिये

 

चलने की कोशिशों में मैं माना फिसल गया

पर यूं हँसा जमाना क्यूँ खुद आप सोचिये  

 

जो हँस रहे थे हाथों में ले हार हैं खड़े

बदला हुआ नजारा क्यूँ खुद आप सोचिये

 

मौलिक व अप्रकाशित

डॉ आशुतोष मिश्र 

Views: 709

Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 7, 2014 at 11:41pm

जो हँस रहे थे हाथों में ले हार हैं खड़े

बदला हुआ नजारा क्यूँ खुद आप सोचिये.. ... . .इस शेर को तकाबुले रदीफ़ से बचालिया होता तो एक दमदार कहन साझा करता हुआ शेर हुआ है.

दाद कुबूल कीजिये, आदरणीय आशुतोष भाईजी..

सादर

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 1, 2014 at 11:30am

आदरणीय लक्षमण जी ..आपके स्नेहिल शब्दों के लिए तहे दिल धन्यवाद ..सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 1, 2014 at 11:25am

आदरणीय विजय सर ...बस आपका आशीर्वाद यूं ही मिलता रहे 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 1, 2014 at 11:25am

आदरणीय गिरिराज भाईसाब...मुझे आपकी स्नेह की सदैव जरूरत है ..आपके स्नेहिल शब्दों के लिए तहे दिल धन्यवाद 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 1, 2014 at 11:17am

आदरणीया अन्नपूर्णा जी ..स्नेहिल इन शब्दों  के लिए तहे दिल धन्यवाद सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 1, 2014 at 11:14am

आदरणीय भुवन जी .. आदरणीय जीतेन्द्र जी ...उत्साहवर्धक इन शब्दों के लिए तहे दिल ध्न्यवाद सादर 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 1, 2014 at 10:38am

आदरणीय भाई आशुतोष जी इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए कोटि कोटि बधाई कबूल करें .

Comment by vijay nikore on April 1, 2014 at 10:19am

इस अच्छी गज़ल के लिए बधाई।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 1, 2014 at 9:58am

आदरनीय आशुतोश भाई , बहुत अच्छी गज़ल कही है , इतने भारी रदीफ को निभाना आसान काम नही है  !! आपको तहे दिल से बधाइयाँ ॥

Comment by annapurna bajpai on March 31, 2014 at 11:28pm

बहुत खूब !! आ0 आशुतोष जी बधाई आपको इस सुंदर गजल के लिए । 

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