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ग़ज़ल – फूल की ख़ुशबू को हम यूं भी लुटा देते हैं

ग़ज़ल


फाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फैलुन 
२१२२   ११२२    ११२२   २२ 

फूल की ख़ुशबू को हम यूं भी लुटा देते हैं |
करते हैं इश्क़ ज़माने को बता देते है |

एक चिंगारी है सीने में हवा देते हैं |
हम ग़ज़ल कहते हुए ख़ुद को सज़ा देते हैं |

जिसकी शाखों पे घरौंदों में मुहब्बत ज़िंदा ,
ऐसे पेड़ों को परिंदे भी दुआ देते हैं |

इश्क़ लहरों से अगर है तो क़िला गढ़ना क्या ,
रेत के घर को बनाते हैं मिटा देते हैं |

हम भी शेरों में बयाँ करते हैं अफ़साने को ,
और अफ़साने को तारीख़ी बना देते हैं |

हो यकीं ख़ुद पे तो सैलाबों को रुकना होगा ,
हौसले वालों को रस्ता भी ख़ुदा देते हैं |

* मौलिक एवं अप्रकाशित

- अभिनव अरुण

Views: 788

Comment

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Comment by Abhinav Arun on April 5, 2014 at 7:05pm
आभार आदरणीया Dr.Prachi Singh जी !

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 1, 2014 at 5:55pm

एक चिंगारी है सीने में हवा देते हैं |
हम ग़ज़ल कहते हुए ख़ुद को सज़ा देते हैं |

हो यकीं ख़ुद पे तो सैलाबों को रुकना होगा ,
हौसले वालों को रस्ता भी ख़ुदा देते हैं |

बहुत सुन्दर शेर हुए है आ० अभिनव अरुण जी 

बहुत बहुत बधाई 

Comment by Abhinav Arun on March 30, 2014 at 3:15pm
सादर आभार एवं अभिवादन आपकी कृपा के लिए आदरणीय श्री Saurabh Pandey जी !!

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 28, 2014 at 1:28am

एक समझदार ग़ज़ल के लिए बहुत-बहुत बधाई, भाई अभिनव अरुण जी.

सभी शेर अच्छे हुए हैं. दाद कुबूल करें.

शुभ-शुभ

Comment by Abhinav Arun on March 25, 2014 at 3:09pm

आदरणीय श्री वीनस जी मार्गदर्शन के लिए शुक्रिया ,  बताये अनुसार  संशोधित कर लिया है , आभार !!

Comment by Abhinav Arun on March 25, 2014 at 2:38pm

सर्व श्री नीरज जी , आशीष जी , अजय जी , धर्मेन्द्र जी प्रोत्साहन के लिए आभार और शुक्रिया आप सबका !!

Comment by Abhinav Arun on March 25, 2014 at 2:37pm

आदरणीय श्री वीनस जी , विजय जी, शिज्जू  जी हार्दिक आभार मेरा हौसला बढ़ाने केलिए !

Comment by विजय मिश्र on March 24, 2014 at 4:11pm
समूची गजल एक ऊँचे मिजाज की है और एक ही रओ में भी है मगर ये आखिरी मिसरा वाकई लाजवाब है |अनेक बधाई अरुणजी |

"हो यकीं ख़ुद पे तो सैलाबों को रुकना होगा ,
हौसले वालों को रस्ता भी ख़ुदा देते हैं |"
Comment by वीनस केसरी on March 24, 2014 at 12:56am

भाई जी आपकी ग़ज़ल के लिए ढेरो ढेर दाद
हर शेर अपने आप में मुकम्मल बयान है

बस बहर के लिए ध्यान दिलाना चाहूंगा की अरकान आपने गलत लिख दिया है

ये इस प्रकार होगा
फाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फैलुन
२१२२   ११२२    ११२२   २२

हाँ ये मजेदार बात है की आपकी ग़ज़ल हर तरह से इस नयी बहर में दुरुस्त है 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 23, 2014 at 6:54pm

बहुत सुंदर ग़ज़ल आदरणीय अभिनव जी बहुत बहुत बधाई आपको

कृपया ध्यान दे...

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