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2112     2112   2112    112
**********************************************
दाग  चंदा   को  लगे  हैं, सूरज  का  क्या गया
ढूँढ  लेगा रात  को  वो, फिर से  कोई घर नया

बादलों  को  थी  मनाही ,  कैसे   करते  बारिसें
उसके  सूखे  दामनों  पर, आँसुओं  ने  की दया

कौन बोले, किसको बोले, इस सियासत में बुरा
सब  हमामों  के चरित्तर, शेष  किसमें  है हया

बाज  के  थे  सहायक  चील ,  कौवे  औ’ उलूक
फिर अकेली  बाज से, कब   तलक लड़ती बया

सोच का  पिछडे़ हुए में, था  बुजुर्गों का लिहाज
आधुनिक  होकर ‘मुसाफिर’, हो गया वो बेहया

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by annapurna bajpai on December 23, 2013 at 6:27pm

आ0 लक्ष्मण जी गजल के भाव तो अच्छे हैं , परंतु आ0 अरुण जी बात पर भी गौर करना जरूरी हो जाता है , क्योंकि आपकी गजल मे काफिया नहीं दिखता । आप स्वयम भी एक बार देख लें । 

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 23, 2013 at 1:24pm

आदरणीय लक्ष्मण जी मेरे हिसाब आपकी ग़ज़ल में काफिया ही नहीं है इस लिहाज से आपकी ग़ज़ल ख़ारिज हो जाती है. एक बार आप भी गौर फरमाएं.

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on December 20, 2013 at 10:34pm

अच्छी गज़ल, बधाई लक्ष्मण भाई॥

Comment by ajay sharma on December 20, 2013 at 10:19pm

दाग  चंदा   को  लगे  हैं,  surya  का  par  क्या गया 
ढूँढ  लेगा रात  को  वो, फिर से  कोई घर नया

baaki sher behad khas huye hain.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 20, 2013 at 9:30pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई , गज़ल के भाव और विचार बहुत अच्छे लगे , आपको बधाइयाँ ॥ बह्र मे गड़्बड़ी लग रही है , एक बात और तक्तीअ कर देखें ॥ जैसे - दाग  चंदा  / को  लगे  हैं,/ सूरज  का  /क्या गया

                         2122 या 2121 /  2112    /   222      /  112   ----  एक बात तक्तीअ बाक़ी मिसरों का भी कर के देख लें ॥

Comment by नादिर ख़ान on December 20, 2013 at 8:04pm

कौन बोले, किसको बोले, इस सियासत में बुरा
सब  हमामों  के चरित्तर, शेष  किसमें  है हया

आदरणीय लक्ष्मण जी बहुत खूब ..........उम्दा गज़ल के लिए बधाई

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 20, 2013 at 6:58pm

धामी जी

बहुत सुन्दर ग़ज़ल  i  बधाई हो i

Comment by AVINASH S BAGDE on December 20, 2013 at 6:52pm

बादलों  को  थी  मनाही ,  कैसे   करते  बारिसें
उसके  सूखे  दामनों  पर, आँसुओं  ने  की दया..wah!..wah!

सब  हमामों  के चरित्तर, शेष  किसमें  है हया..bebak bayani..laxman dhami ji..

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