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फिर मिलेगा हमें वो मान भी क्या(ग़ज़ल)

2122 -1212- 112

कट ही जाये अगर ज़बान भी क्या

फिर मिलेगा हमें वो मान भी क्या

 

आदमीयत के मोल जो मिली हो

दोस्तो ऐसी कोई शान भी क्या

 

मेरे पैरों में आज पंख लगे

अब ज़मीं क्या ये आसमान भी क्या

 

छोड दें गर ज़मीन अपने लिये

ऐसे सपनों की फिर उड़ान भी क्या

 

और के काम आ सके न कभी

ऐसा इंसान का है ज्ञान भी क्या

 

भाग के गर मुसीबतों से कहीं

बच ही जाये तो ऐसी जान भी क्या

 

एक चिंगारी से लगी थी आग

अब बचेगा मेरा मकान भी क्या

 

-मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 27, 2013 at 7:04pm

आदरणीया महिमा जी हौसलाअफ़्ज़ाई के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by MAHIMA SHREE on December 25, 2013 at 7:41pm

मेरे पैरों में आज पंख लगे

अब ज़मीं क्या ये आसमान भी क्या... 

 

छोड दें गर ज़मीन अपने लिये

ऐसे सपनों की फिर उड़ान भी क्या.... आदरणीय शिज्जू जी ..बहुत ही खुबसूरत गज़ल.. बधाई आपको 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 22, 2013 at 3:11pm

आदरणीया वंदना जी आपका तहेदिल से शुक्रिया

Comment by vandana on December 22, 2013 at 7:47am

 

मेरे पैरों में आज पंख लगे

अब ज़मीं क्या ये आसमान भी क्या

 

छोड दें गर ज़मीन अपने लिये

ऐसे सपनों की फिर उड़ान भी क्या

 

और के काम आ सके न कभी

ऐसा इंसान का है ज्ञान भी क्या

बहुत शानदार अशआर आदरणीय शिज्जू जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 20, 2013 at 11:29pm

आदरणीय लक्ष्मण जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 20, 2013 at 11:28pm

आदरणीय सौरभ सर हौसलाअफ़्ज़ाई के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 20, 2013 at 11:28pm

आदरणीय विजय निकोर सर आपका बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 20, 2013 at 8:14am

छोड दें गर ज़मीन अपने लिये

ऐसे सपनों की फिर उड़ान भी क्या

बहुत खूब


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 20, 2013 at 12:50am

मेरे पैरों में आज पंख लगे

अब ज़मीं क्या ये आसमान भी क्या... . भाईजी, बहुत बढिया शेर हुआ है..

इस ग़ज़ल के लिए बधाई.. .

Comment by vijay nikore on December 19, 2013 at 7:19pm

//एक चिंगारी से लगी थी आग

अब बचेगा मेरा मकान भी क्या//

 

इस बेहतरीन गज़ल के लिए बधाई।

सादर,

विजय निकोर

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