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इसलिए तो आज भी बर्बाद हैं हम / ग़ज़ल "संदीप पटेल "दीप"

रस्म वाले देश की औलाद हैं हम
आज के बच्चे कहें सैयाद हैं हम

उनकी बीबी मायके जब से गयी है  
कहते फिरते आजकल आज़ाद हैं हम

ढँक गए हैं गर्द से तो भूलिए मत
इस महल की रीढ़ हैं बुनियाद हैं हम

छोड़ के वो हाथ मेरा जो चले थे
गमजदा हैं देख ये आबाद हैं हम

"दीप" हरदम की मदद है दूसरों की
इसलिए तो आज भी बर्बाद हैं हम

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 8, 2013 at 12:43am

बहुत बढिया.. !

शेर दर शेर कहन हामी लेता हुआ है. बधाई ! बधाई !!

ग़ज़ल के अश’आर के बीच में ही पुछल्ला भी आ गया है .. . :-))))शुभ-शुभ

Comment by Dr Ashutosh Mishra on December 4, 2013 at 6:39am

"

ढँक गए हैं गर्द से तो भूलिए मत
इस महल की रीढ़ हैं बुनियाद हैं हम

दीप" हरदम की मदद है दूसरों की 
इसलिए तो आज भी बर्बाद हैं हम....बेहतरीन ग़ज़ल के ये शेर मुझे बेहद पसंद आये ..सब कंगूरे की ईंट बनना चाहते है  लेकिन नीव अगर हिल जाए तो सबको समझ में आ जाईगी ......सच है लोगों के सुख दुःख में खड़े होकर हम आज की तथाकथित सफलता से कोसों दूर हो गए ....लाजबाब ग़ज़ल ..ढेरों बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 4, 2013 at 12:02am

आदरणीय संदीप जी बेहतरीन ग़ज़ल है गंभीर अशआर के बीच एक मज़ाकिया शेर भी गुदगुदा गया बधाई स्वीकार करें

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on December 3, 2013 at 11:01pm

अच्छी गज़ल हुई, बधाई संदीप भाई । 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 3, 2013 at 3:46pm

पटेल जी

क्या बात है  ? बहुत अच्छी  लगी i

आपको धन्यवाद i

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 3, 2013 at 12:29pm


छोड़ के वो हाथ मेरा जो चले थे
गमजदा हैं देख ये आबाद हैं हम .

   

बहुत खूब कहा 

Comment by वीनस केसरी on December 3, 2013 at 2:26am

ढँक गए हैं गर्द से तो भूलिए मत
इस महल की रीढ़ हैं बुनियाद हैं हम

वाह वा भाई जी अच्छी ग़ज़ल कही है

Comment by ram shiromani pathak on December 3, 2013 at 12:15am

 सुन्दर  ग़ज़ल बहुत बधाई आदरणीय संदीप भाई  जी  … सादर 

Comment by Sarita Bhatia on December 2, 2013 at 8:06pm

बहुत अच्छे 

Comment by विजय मिश्र on December 2, 2013 at 5:42pm
खूब

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