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भाव की हर बांसुरी में

भर गया है कौन पारा ?

देखता हूं

दर-बदर जब

सांझ की

उस धूप को

कुछ मचलती

कामना हित

हेय घोषित

रूप को

सोचता हूं क्‍या नहीं था

वह इन्‍हीं का चांद-तारा ?

बौखती इन

पीढि़यों के

इस घुटे

संसार पर

मोद करता

नामवर वह

कौन अपनी

हार पर

शील शारद के अरों को

ऐंठती यह कौन धारा ?

इक जरा सी

आह सुन जो

छूटता

ले प्राण था

तू ही जिनकी

जिंदगी था

तू ही जिनकी

जान था

चाहते थे वे रथी कब

सारी धरती व्‍योम सारा ?

देवता वो

कौन है जो

हर सके

इस पाप को

गुणसूत्र की

वेणी पकड़ ये

लीलते बस

'आप' को

स्‍वार्थ की ताबीज ताने

किसने है ये मंत्र मारा ?

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by कल्पना रामानी on December 20, 2013 at 3:58pm

आज एक और भावपूर्ण सुंदर नवगीत पढ़ा। मन बार बार पढ़ने को कहता रहा और 4 बार पढ़ लिया। सार्थक चर्चा का भी लाभ उठाया। आदरणीय सौरभ जी का हार्दिक आभार और आदरणीय राजेश जी आपको अनंत बधाइयाँ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 5, 2013 at 11:08pm

आपसी सीखने में भूल-चूक-क्षमा का क्या प्रयोजन आदरणीय राजेश मृदुजी ? हम सब समवेत ही सीख रहे हैं.

अपने कहे को तनिक और स्पष्ट करते हुए मैं हिन्दी साहित्य में नवगीत विधा के वरिष्ठतम हस्ताक्षर गुलाब सिंहजी का एक नवगीत प्रस्तुत कररहा हूँ, आदरणीय.
देखिये आपकी ही रचना के विन्यास में ही यह नवगीत है. यानि २१२२ २१२२ २१२२ २१२२ के भार में शब्द संयोजन है. इस प्रस्तुति के प्रत्येक बन्द में जिस सुगढ़ता से शब्द पिरोये गये हैं वह श्लाघनीय ही नहीं, अनुकरणीय भी है.
इसी तरह की चर्चा में पिछले दिनों मैंने एक अन्य टिप्पणी में अपनी ही रचना प्रस्तुत की थी. लेकिन मुझे मालूम है कि ऐसा कोई प्रयास आपके तार्किक मनस को पूर्ण संतुष्टि नहीं दे पायेगा. क्योंकि फिर वह उस टिप्पणीकार का ही प्रयास होगा जो आपकी रचना के विन्यास पर चर्चा भी कर रहा है.

गुलाब सिंहजी की प्रस्तुत रचना में न कोई अक्षर ’उठाया’ गया है न ’गिराया’ गया है. न ही शब्द विन्यास बदल रहा है. और, भावदशा मुखर हो कर अभिव्यक्त हुई है !
हम क्यों न ऐसे पुरोधाओं का अनुसरण करें !
***
घाट से हटकर
==========
जाल है भीतर नदी के
घाट से हटकर नहाना.

पीठ पर लहरें, हवायें
झेलते हैं
आइने सा मुस्कुराकर
आदमी से खेलते हैं

भीड़ से भीगे तटों के -
पत्थरों का क्या ठिकाना ?

धार उल्टे पाँव चलकर
सीढ़ियों से
सट रही है
फिर करोड़ों की इमारत
हाँ-नहीं में छँट रही है

हर कदम पर सिर झुकाते
भूल बैठे सिर उठाना !

इस नवगीत के किसी बन्द में इस विन्यास के अलावे का कोई विन्यास अतुकान्त ही कहलायेगा और किसी जागरुक पाठक की दृष्टि में असहज प्रयास समझा जायेगा.

शुभ-शुभ

Comment by राजेश 'मृदु' on December 5, 2013 at 6:02pm

आदरणीय सौरभ जी की टिप्‍पणी से मुझको उत्‍तर मिल गया । आदरणीय सौरभ जी एवं प्राची जी, आप दोनों का हार्दिक आभार, बहुत आपका सिर खाया, भूल-चूक क्षमा करें, सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 5, 2013 at 3:52pm

आदरणीय राजेश जी के प्रश्न का उत्तर कहाँ से दूं.... ये सिरा मेरी पकड़ में नहीं आ रहा था :)))

विश्वास है आ० सौरभ जी के कहे से राजेश जी की जिज्ञासा को उत्तर प्राप्त हुआ होगा.

सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 4, 2013 at 5:36pm

आदरणीय,

तो को ना ही लिखे ना ? यह कैसा मंतव्य है कि रचनाओं में ना का प्रयोग दोषयुक्त होता है ?

वस्तुतः शब्द-विन्यास कोई हो, रचना की पंक्तियों की कुल मात्रिकता को अप्रभावी रखे. बस ! आपने कई रचनाओं से सचेत पाठकों को मुग्ध किया है.

सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on December 4, 2013 at 5:15pm

आदरणीय, मैं मात्रा गिरने या बढ़ने की बात कर रहा हूं । 'किसने है ये मंत्र मारा' में ने को मात्रा गिराकर पढ़ना पड़ रहा है ठीक उसी तरह देखिए को वास्‍तव में देखिए ना पढ़ना पड़ सकता है या नहीं ? खास तौर से तब जब मनुहार का भाव हो, और इस स्थिति में मात्रा भी बढ़ जाएगी । मैं यही कहना चाहता हूं, सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 4, 2013 at 10:40am

आदरणीया प्राचीजी, आपने बहुत ही धैर्य के साथ विन्दुओं को सार्थक रूप से स्पष्ट किया है. मुझे हार्दिक खुशी हुई है.

जितना मैंने आजतक के साथ और व्यवहार में जाना है, आदरणीय राजेश मृदुजी तनिक क्लिष्ट श्रोता रहे हैं. संभवतः क्लिष्ट विद्यार्थी भी ! आदरणीय राजेश मृदु जी का व्यावहारिक अनुभव और कई विषयों का गहन एवं विस्तृत अध्ययन आपके विद्यार्थी को इतने आवरण मुहैया कराते रहते हैं कि विस्मित होना पड़ता है. और, आपके प्रश्न कई बार धैर्य की भी परीक्षा लेते हुए हैं. .. :-)))

दखिये न, कितनी मासमियत से आपने पूछा है --  जो दिख रहा है उच्‍चारण भी ठीक वैसा ही होना चाहिए जैसे हम यदि लिखो न कहें तो उसे वास्‍तव में लिखो ना पढ़ा जाएगा.

लिखो न क्यों लिखो ना पढ़ा जायेगा स्वयं मुझे ही स्पष्ट नहीं हुआ. .. :-)))

Comment by राजेश 'मृदु' on December 3, 2013 at 4:42pm

यानि जो दिख रहा है उच्‍चारण भी ठीक वैसा ही होना चाहिए जैसे हम यदि लिखो न कहें तो उसे वास्‍तव में लिखो ना पढ़ा जाएगा, क्‍या मैं सही हूं आदरेया ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 3, 2013 at 4:27pm

आदरणीय राजेश जी 

यह बिन्दुवत तथ्यपरक चर्चा आपको सार्थक लगी और आपके लेखन संवर्धन के लिए उपयोगी लगी तो मेरा प्रयास सार्थक हुआ. हम सभी इसी तरह समवेत सीखते हैं.. और यही ज़रूरी भी है.

//किंतु अभी भी एक बात मुझे पूरी तरह समझ में नहीं आ रही, आपने कहा यद्यपि कारक विभक्तियों में ये सहज लग रहा है  इस बात को थोड़ा समझा सकें तो बड़ी कृपा होगी, उदाहरण दे सकें तो मैं जल्‍दी समझ जाउंगा//

सबसे पहले मैं कारक विभक्तियों को स्पष्ट कर देती हूँ...

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से संज्ञा या सर्वनाम का क्रिया से सम्बन्ध सूचित होता है उसे 'कारक' कहते हैं .

हिंदी में आठ तरह के कारक होते हैं:

1.कर्ता ( क्रिया को करने वाला )........................................इसके लिए विभक्ति 'ने' प्रयुक्त होती है , जैसे राम ने रावण को मारा यहाँ 'ने' कर्ता कारक की विभक्ति है .

2. कर्म (जिस पर क्रिया का प्रभाव पड़ता है)........................इसके लिए विभक्ति 'को' प्रयुक्त होती है , जैसे राम ने रावण को मारा यहाँ 'को' कर्म कारक की विभक्ति है.

3.करण (वह साधन जिससे क्रिया संपन्न होती है)................से, के द्वारा , के साथ  आदि......जैसे राम ने रावण को धनुष बाण से मारा...यहाँ से करण कारक की विभक्ति है.

इसी तरह  4.सम्प्रदान ( के लिए , को, के, निमित्त), 5. अपादान (से),   6.अधिकरण ( में, पर, पे ),   7. सम्बन्ध (का, के, की; रा, रे, री; ना, ने)   8.संबोधन (अरे, रे, ओ, हे, अरी, री) आदि सभी कारक विभक्तियाँ हैं......जिनके बिना कोइ भी वाक्य गठित नहीं हो सकता.

अब आपके रचना का एक अंश लेते हैं ...

जैसे ..किसने है ये मंत्र मारा ? ..यहाँ ने एक कारक विभक्ति है ,यदि इसे गिरा पर पढ़ा जा रहा है तो सहज लग सकता है 

लेकिन अन्य मुख्य शब्दों संज्ञा सर्वनाम या क्रिया में मात्रा को गिरा पर पढना असहज लगता है .

वैसे कारक विभक्तियों के लिए भी इस छूट को लेने से यथासंभव बचना की श्रेयस्कर है...लेकिन कई वार्णिक छंदों  जैसे सवैया आदि में यह मान्य भी है. मात्रिक छंदों में इस प्रकार से ,मात्रा को गिराना बिलकुल भी स्वीकार्य नहीं होता. पर नवगीत और गीत जैसी विधाएं बहुत विस्तार की गुंजाइश रखती हैं.. सो यहाँ एक हद तक संयत रहते हुए इनकी स्वीकार्यता है.

इस विषय में सुधि जानकार और तथ्य सांझा करें तो यह बिन्दु पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगा.

अपनी समझ भर मैंने सांझा करने का प्रयत्न किया है 

सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 3, 2013 at 4:01pm

प्रस्तुत नवगीत में निर्बाध गेयता निर्वहन के लिए शब्द विन्यास , वार्णिकता या मात्रिकता निर्वहन में जहां मुझे दोष लगा मैंने वह इंगित कर स्पष्ट करने का प्रयास किया.. इसकी सार्थकता पर आपके अनुमोदन के लिए धन्यवाद आदरणीय सौरभ जी.

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