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ग़ज़ल - अक्षरों में खुदा दिखाई दे !

ग़ज़ल –

२१२२ १२१२ २२

अक्षरों में खुदा दिखाई दे

अब मुझे ऐसी रोशनाई दे |

 

हाथ खोलूं तो बस दुआ मांगूँ,

सिर्फ इतनी मुझे कमाई दे |

 

रोशनी हर चिराग में भर दूं ,

कोई ऐसी दियासलाई दे |

 

माँ के हाथों का स्वाद हो जिसमें,

ले ले सबकुछ वही मिठाई दे |

 

धूप तो शहर वाली दे दी है,

गाँव वाली बरफ मलाई दे |

 

बेटियों को दे खूब आज़ादी ,

साथ थोड़ी उन्हें हयाई दे |

 

तल्ख़ लहजा तमाम लोगों को,

मीर दे मीर की रुबाई दे |

 

दर्द होरी सा दे रहा है तो,

साथ धनिया सी एक लुगाई दे |

 

घूस के सौ दहेज़ से बेहतर,

अपने हाथों बनी चटाई दे |

       *सर्वथा मौलिक - अप्रकाशित .

       (c)&(p)  - अभिनव अरुण .

      

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Comment by ram shiromani pathak on November 17, 2013 at 12:42am

अक्षरों में खुदा दिखाई दे

अब मुझे ऐसी रोशनाई दे |

 

हाथ खोलूं तो बस दुआ मांगूँ,

सिर्फ इतनी मुझे कमाई दे |

 

रोशनी हर चिराग में भर दूं ,

कोई ऐसी दियासलाई दे |

 

माँ के हाथों का स्वाद हो जिसमें,

ले ले सबकुछ वही मिठाई दे |//////वाह वाह वाह आदरणीय बहुत खूब 

वाह वाह वाह आदरणीय अभिनव अरुण जी  बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल कही आपने  /// हार्दिक बधाई  आपको///सादर  


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 16, 2013 at 9:53pm

दर्द होरी सा दे रहा है तो,
साथ धनिया सी एक लुगाई दे ..
इस शेर पर दिल-जान सब क़ुर्बान कर दूँ भाई.. फिर भी मन में ये कचोट बना रहे कि काश कुछ और लुटा पाते.

ग़ज़ल जब दिल से हो तो उसकी तासीर गहरे तक असर करती है. यही कुछ हुआ है इस दफ़े. बह्र छोटी लेकिन मेयार वाह वाह.. .

लेकिन साथ ही एक कण्ट्रोवर्सी पैदा कर दूँ ? शहर वाले बरफ़ खाने लगे क्या ? !!
ख़ैर छोड़िये.. .. हा हा हा हा हा... मैं जानता हूँ आप समझ गये हैं.
:-)))))))))))

दिल से बधाई ..

Comment by SALIM RAZA REWA on November 16, 2013 at 8:14pm

अभिनव अरुण जी

अच्छी ग़ज़ल के लए मुबारकबाद//

00

अक्षरों में खुदा दिखाई दे

अब मुझे ऐसी रोशनाई दे |

 

हाथ खोलूं तो बस दुआ मांगूँ,

सिर्फ इतनी मुझे कमाई दे |

Comment by Abhinav Arun on November 16, 2013 at 6:25pm

आपके स्नेह से ग़ज़ल निखरी है , ह्रदय से आभार आदरणीय श्री आशीष'सलिल ' जी अभिवादन आपका !

Comment by Abhinav Arun on November 16, 2013 at 6:23pm

प्रयोग आपके मन भाये हार्दिक प्रसन्नता हुई आ. डॉ आशुतोष जी शुक्रिया

Comment by Abhinav Arun on November 16, 2013 at 6:23pm

आ. सत्यनारायण जी आभार ग़ज़ल आपको पसंद आई लेखन सार्थक हुआ

Comment by Satyanarayan Singh on November 16, 2013 at 5:30pm

उम्दा गजल जिसके हर शेर लाजबाब है. बहुत खूब आदरणीय अरुण जी हार्दिक बधाई स्वीकार करें

Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 16, 2013 at 3:14pm

बेटियों को दे खूब आज़ादी ,

साथ थोड़ी उन्हें हयाई दे |...आदरणीय अभिनव जी ..शेरो के माध्यम से आपने विविध बिषयों को छुआ ..हर प्रयोग अच्छा लगा आपको तहे दिल बधाई ..सादर 

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on November 16, 2013 at 11:44am

तल्ख़ लहजा तमाम लोगों को,

मीर दे मीर की रुबाई दे |

 

दर्द होरी सा दे रहा है तो,

साथ धनिया सी एक लुगाई दे |

 

वाह वाह !!
अद्भुत ग़ज़ल आदरणीय अरुण जी... 
दाद कुबूल हो |

Comment by Abhinav Arun on November 16, 2013 at 8:00am

मेरी कोशिश जची इसके लिए दिल से शुक्रिया आपका श्री सारथी जी 

कृपया ध्यान दे...

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