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धिक्कारो ऐसा नेता-

हो जाती कुदरत खफा, देती मिटा वजूद ।

उलथ उत्तराखंड ज्यों, होय नेस्तनाबूद ।।

क्या मूरख मानव चेता ।।

विस्फोटों से तोड़ते, ऊंचे खड़े पहाड़ ।

हाड़ कुचलते शैलखंड, अपना मौका ताड़ ।।

ऐसे ही बदला लेता ।।

सरिता-झरना का करे, मनुज मार्ग अवरुद्ध ।

कुछ वर्षों में ही मगर, कर दे वर्षा शुद्ध ।।

जीव-जंतु घर बार समेता ॥

विजय होय बहु-गुणों से, किन्तु चेतना सून।

मार जाय लाखों मनुज, ज्यों तेरह का जून ॥

धिक्कारो ऐसा नेता ॥

मौलिक / अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on July 3, 2013 at 9:45pm

आदरणीय सटीक पुच्छल दोहों के लिये हार्दिक शुभकामनायें..........

Comment by Sumit Naithani on July 3, 2013 at 2:43pm

सुन्दर रचना.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 3, 2013 at 10:23am

//तेरह का जून से तातपर्य सन तेरह का जून है//

अब ये कैसी कहन है भाई जी? बिना किसी उद्धरण या सटीक इंगित ऐसा कोई विन्दु कूट ही नहीं महाविकट भी होता है. ऐसा प्रयास ... . खैर.

शुभम्

Comment by रविकर on July 3, 2013 at 9:20am

तेरह का जून से तातपर्य

सन तेरह का जून है आदरणीय-
सादर आभार


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 3, 2013 at 7:35am

पुछल्ले वाले दोहों की बयार अच्छी बहायी आपने, आदरणीय रविकर भाईजी.

बहुत सुन्दर प्रयास हुआ है और पठनीय रचना हुई है.  ढेर सारी बधाई..

तेरह जून को सत्तरह जून क्यों न किया जाय ? तेरह से कुछ विशेष है क्या ? सत्तरह जून की विभीषिका से तो सभी परिचित हुए हैं.

सादर

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 3, 2013 at 2:29am
आदरणीय..रविकर जी, सुंदर रचना प्रस्तुति पर बधाई
Comment by Harish Upreti "Karan" on July 2, 2013 at 6:39pm

सुन्दर रचना.......बधाई.....

Comment by Shyam Narain Verma on July 2, 2013 at 6:23pm

बहुत ही सुन्दर रचना , हार्दिक बधाई.......................................

Comment by coontee mukerji on July 2, 2013 at 3:47pm

हो जाती कुदरत खफा, देती मिटा वजूद ।

उलथ उत्तराखंड ज्यों, होय नेस्तनाबूद ।।

क्या मूरख मानव चेता ।।...............सच है कोई समझे या न समझे ,प्रकृति अपना बदला ले ही लेती है.

Comment by ram shiromani pathak on July 2, 2013 at 2:32pm

वाह आदरणीय रविकर जी बहुत ही सुन्दर रचना //हार्दिक बधाई आपको

कृपया ध्यान दे...

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