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बिपदा बढ़ती बहु-गुणा, बा-शिंदे बेहाल -

 बिपदा बढ़ती बहु-गुणा, बा-शिंदे बेहाल |
बस-बेबस बहते बहे, बज-बंशी भूपाल |  
बज बंशी भूपाल, बहर बंदिशें सुरीली |
मनमोहन मदमस्त, मगन मीरा शर्मीली |
चले अचल छल-चाल, भयंकर नदी बिगडती  |   
चारो तरफ बवाल, हमारी बिपदा बढ़ती ||  

मौलिक / अप्रकाशित
 

Views: 514

Comment

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Comment by MAHIMA SHREE on July 7, 2013 at 3:12pm

आदरणीय रविकर सर .. बहुत ही सुंदर कुंडलियाँ .. शब्दों का संयोजन लाजवाब ... बहुत -२ बधाई आपको

Comment by बृजेश नीरज on July 5, 2013 at 11:14pm

वाह आदरणीय बहुत सुन्दर! हार्दिक बधाई आपको!

Comment by coontee mukerji on July 5, 2013 at 7:46pm

चले अचल छल-चाल, भयंकर नदी बिगडती  |   
चारो तरफ बवाल, हमारी बिपदा बढ़ती |........यही तो विडम्बना है रविकर जी. जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो .....क्या करें?

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 5, 2013 at 1:21pm

वाह ! रविकर भाई शब्द संयोजन और संधि-विच्छेद कर छंद रचना में आपका मुकाबला नहीं | हार्दिक बधाई 

बहुगुणा  बहु-गुणित हुए, चर्चा में मगरूर 

बढती विपदा दे रही,  जनप्रियता  भरपूर 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 5, 2013 at 9:24am

आ0 रविकर भाई जी,    बहुत ही शानदार, शालीन और शर्मीली फटकार के साथ-ही साथ सिमटती सांझ की दुर्दशा का सुन्दर चित्रण। इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई।   सादर,

Comment by aman kumar on July 5, 2013 at 8:15am

अति सुंदर ..........

Comment by वेदिका on July 5, 2013 at 2:47am

 बहुत बहुत खूब  सुंदर छंद की रचना की आपने  आदरणीय कुण्डलिया सम्राट रविकर जी! 

सच मुच   आपकी कलम में जादू है,, नमन !! 

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