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रविकर's Blog (76)

पाव पाव दीपावली, शुभकामना अनेक-

पाव पाव दीपावली, शुभकामना अनेक |
वली-वलीमुख अवध में, सबके प्रभु तो एक |


सब के प्रभु तो एक, उन्हीं का चलता सिक्का |
कई पावली किन्तु, स्वयं को कहते इक्का |


जाओ उनसे चेत, बनो मत मूर्ख गावदी |
रविकर दिया सँदेश, मिठाई पाव पाव दी ||

मौलिक / अप्रकाशित

वली-वलीमुख = राम जी / हनुमान जी
पावली=चवन्नी
गावदी = मूर्ख / अबोध

Added by रविकर on November 3, 2013 at 9:00am — 13 Comments

नया बने सम्बन्ध, पकाओ धीमा धीमा-

सीमांकन दूजा करे, मर्यादा सिखलाय |
पहला परवश होय तब, हृदय देह अकुलाय |


हृदय देह अकुलाय, लगें रिश्ते बेमानी |
रविकर पानीदार, उतर जाता पर पानी |


यह परिणय सम्बन्ध, पके नित धीमा धीमा |
करिए स्वत: प्रबन्ध, अन्य क्यूँ पारे सीमा -

मौलिक / अप्रकाशित
(दुर्गा-पूजा / विजयादशमी की मंगल-कामनाएं )

Added by रविकर on October 10, 2013 at 4:00pm — 11 Comments

बचपन तब का और था, अब का बचपन और

(1)

बचपन तब का और था, अब का बचपन और |

दादी की गोदी मिली, नानी हाथों कौर |



नानी हाथों कौर, दौर वह मस्ती वाला |

लेकिन बचपन आज, निकाले स्वयं दिवाला |



आया की है गोद, भोग पैकट में छप्पन |

कंप्यूटर के गेम, कैद में बीते बचपन ||

(2)

संशोधित रूप-

तब का बचपन और था, अब का बचपन और |

तब दादी गोदी मिली, नानी से दो कौर |

नानी से दो कौर, दौर वह मस्ती वाला |

लेकिन बचपन आज, महज दिखता दो साला…

Continue

Added by रविकर on October 9, 2013 at 9:00am — 15 Comments

ये दिल मांगत मोर-

दुर्मिल सवैया 

पुरबी उर-*उंचन खोल गई, खुट खाट खड़ी मन खिन्न हुआ |

कुछ मत्कुण मच्छर काट रहे तन रेंगत जूँ इक कान छुआ |

भडकावत रेंग गया जब ये दिल मांगत मोर सदैव मुआ  |

फिर नारि सुलोचन ब्याह लियो शुभचिंतक मांगत किन्तु दुआ  |

उंचन=खटिया कसने वाली रस्सी , उरदावन 

मत्कुण=खटमल 

अप्रकाशित / मौलिक 

Added by रविकर on October 8, 2013 at 4:00pm — 6 Comments

पड़े अनंत उपाय, किन्तु पहले शौचाला-

चित की शुचिता के लिए, नित्य कर्म निबटाय |
ध्यान मग्न हो जाइये, पड़े अनंत उपाय |


पड़े अनंत उपाय, किन्तु पहले शौचाला |
पढ़ देवा का अर्थ, हमेशा देनेवाला |


रविकर जीवन व्यस्त, करे कविता जनहित की |
आत्मोत्थान उपाय, करेगी शुचिता चित की |

मौलिक /अप्रकाशित

Added by रविकर on October 5, 2013 at 5:36pm — 10 Comments

करते नहीं अनर्थ, फैसले शान्त चित्ति के-

शान्त *चित्ति के फैसले, करें लोक कल्यान |
चिदानन्द संदोह से, होय आत्म-उत्थान |


होय आत्म-उत्थान, स्वर्ग धरती पर उतरे |
लेकिन चित्त अशान्त, सदा ही काया कुतरे |


चित्ति करे जो शांत, फैसले नहीं *कित्ति के |
करते नहीं अनर्थ, फैसले शान्त चित्ति के ||


चित्ति = बुद्धि
कित्ति = कीर्ति / यश

अप्रकाशित / मौलिक

Added by रविकर on October 4, 2013 at 11:00am — 11 Comments

बा-शिन्दे अभिमत यही, भेजें यह अभिलेख -

आलू-बंडे से अलग, मुर्गी अंडे देख |
बा-शिन्दे अभिमत यही, भेजें यह अभिलेख |


भेजें यह अभिलेख, नहीं भेजे में आये |
गिरा आम पर गाज, बड़ा अमलेट बनाए |,


भेदभाव कुविचार, किचन कैबिनट में चालू |
अंडे हुवे विशेष, हमेशा काटे आलू ||

मौलिक/ अप्रकाशित

Added by रविकर on October 1, 2013 at 10:24am — 6 Comments

चारा पाती गाय, हुई रौनक गौशाले

गौशाले में गाय खुश, बछिया दिखे प्रसन्न |
बछिया के ताऊ खफा, छोड़ बैठते अन्न |


छोड़ बैठते अन्न, सदा चारा ही खाया |
पर निर्णय आसन्न, जेल उनको पहुँचाया |


करते गधे विलाप, फायदा लेने वाले |
चारा पाती गाय, हुई रौनक गौशाले ||

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on September 30, 2013 at 5:20pm — 11 Comments

दो कुंडलियाँ - रविकर

(1)

हे अबलाबल भगवती, त्रसित नारि-संसार।

सृजन संग संहार बल, देकर कर उपकार।

 

देकर कर उपकार, निरंकुश दुष्ट हो रहे ।

करते अत्याचार, नोच लें श्वान बौरहे।

 

समझ भोग की वस्तु, लूट लें घर चौराहे ।

प्रभु दे मारक शक्ति, नारि क्यूँ सदा कराहे ॥

-----------------------------------------------

(2)

प्रणव नाद सा मुखर जी, पाता है सम्मान |

मौन मृत्यु सा बेवजह, ले पल्ले अपमान |

ले पल्ले अपमान , व्यर्थ मुट्ठियाँ भींचता…

Continue

Added by रविकर on September 28, 2013 at 6:30pm — 10 Comments

सियासती सुपनखा से, सिया-सती अनभिज्ञ -रविकर

कुण्डलियाँ


सियासती सुपनखा से, सिया-सती अनभिज्ञ |
अब क्या आशा राम से, हो रहे स्खलित विज्ञ |


हो रहे स्खलित विज्ञ, बने खरदूषण साले |
घालमेल का खेल, बुराई कुल अपना ले |


नित आगे की होड़, रखेंगे बढ़ा ताजिया |
सिया सती की लाज, बचा ले पकड़ हाँसिया ||

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on September 25, 2013 at 8:58am — 12 Comments

सत्तइसा के पूत पर, पढ़ते मियाँ मिलाद-रविकर

कुण्डलियाँ छंद


टोपी बुर्के कीमती, सियासती उन्माद |
सत्तइसा के पूत पर, पढ़ते मियाँ मिलाद |


पढ़ते मियाँ मिलाद, तिजारत हो वोटों की |
ढूँढे टोटीदार, जरुरत कुछ लोटों की |


रविकर ऐसा देख, पार्टियां वो ही कोपी |
अब तक उल्लू सीध, करे पहना जो टोपी |

अप्रकाशित/मौलिक

Added by रविकर on September 24, 2013 at 9:37pm — 6 Comments

नारी अब अबला नहीं, कहने लगा समाज-रविकर

कुण्डलियाँ-


नारी अब अबला नहीं, कहने लगा समाज ।
है घातक हथियार से, नारि सुशोभित आज ।


नारि सुशोभित आज, सुरक्षा करना जाने ।
रविकर पुरुष समाज, नहीं जाए उकसाने ।


लेकिन अब भी नारि, पड़े अबला पर भारी |
इक ढाती है जुल्म, तड़पती दूजी नारी ।|


मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on September 24, 2013 at 11:53am — 12 Comments

मसले पड़े ज्वलंत, शब्दश: रविकर मसले-

मसले पर जब बलबला, शब्द मनाते जीत |
भाव मौन रहकर मरे, यही पुरातन रीत |

यही पुरातन रीत, तीर शब्दों के घातक |
दे दे गहरी पीर, ढूँढ़ ले खुशियाँ पातक |

बड़े विकारी शब्द, मचलती इनकी नस्लें |
मसले पड़े ज्वलंत, शब्दश: रविकर मसले ||

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on September 23, 2013 at 11:32am — 9 Comments

दंगाई महफूज, मार के निचले-तबके-

तब के दंगे और थे, अब के दंगे और |
हुड़दंगी सिरमौर तब, अब नेता सिरमौर |


अब नेता सिरमौर, गौर आ-जम कर करलें |
ये दंगे के दौर, वोट से थैली भर लें |


मरते हैं मर जाँय, कुचल कर बन्दे रब के |
दंगाई महफूज, मार के निचले-तबके ||

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on September 19, 2013 at 8:42am — 9 Comments

रविकर रोटी सेंक, बोलता जिन्दा रह मत-

रहमत लाशों पर नहीं, रहम तलाशो व्यर्थ |
अग्गी करने से बचो, अग्गी करे अनर्थ |


अग्गी करे अनर्थ, अगाड़ी जलती तीली |
जीवन-गाड़ी ख़ाक, आग फिर लाखों लीली |


करता गलती एक, उठाये कुनबा जहमत |

रविकर रोटी सेंक, बोलता जिन्दा रह मत ||

 

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on September 18, 2013 at 9:00am — 13 Comments

परम्परा प्रतिकूल, बेटकी रविकर खटकी-

टकी टकटकी थी लगी, जन्म *बेटकी होय |

अटकी-भटकी साँस से, रह रह कर वह रोय |


रह रह कर वह रोय, निहारे अम्मा दादी |
मुखड़ा है निस्तेज, नारियां लगती माँदी |


परम्परा प्रतिकूल, बेटकी रविकर खटकी |
किस्मत से बच जाय, कंस तो निश्चय पटकी ||

.
*बेटी

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on September 12, 2013 at 2:00pm — 5 Comments

रहा स्वयं ही ठूस, भरे घर रविकर-ऐंड़ा

ऐंड़ा पेड़ा खाय लें, लेढ़ा जूठन खात |
टेढ़े-मेढ़े साथ में, टेढ़े-टेढ़े जात |


टेढ़े-टेढ़े जात, जात में पूछ बढ़ाये |
खेड़े बेड़े नात, मात त्यौरियाँ चढ़ाए |


टाँय टाँय पर फुस्स, कहीं कुछ नहीं निबेड़ा |
रहा स्वयं ही ठूस, भरे घर रविकर-ऐंड़ा ||

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on September 10, 2013 at 11:01am — 7 Comments

शठ-सत्ता की समझ ले, पुन: जीत आसान-रविकर

सन्ता-बन्ता पर टिके, यदि जनता का ध्यान |
शठ-सत्ता की समझ ले, पुन: जीत आसान |


पुन: जीत आसान, म्यान में रख तलवारें |
जान-बूझ कर जान, आम-जनता की मारें |


इक प्रकोष्ठ तैयार, ढूँढ़ता सकल अनन्ता |
बना नया हथियार, और भी लाये सन्ता ||

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on September 7, 2013 at 7:33pm — 8 Comments

भर देती सन्देह, खोपड़ी रविकर ठनकी-


कमा कमा परदेश में, पिया भुलाते नेह |
सुबह-सवेरे ज्वर कमा, तप्त रात भर देह |


तप्त रात भर देह, मेह रिमझिम सावन की |
भर देती सन्देह, खोपड़ी रविकर ठनकी |


भूल गए क्यूँ गेह, शीघ्र आ जाओ बलमा |
किंवा लाये सौत, हमें देते हो चकमा ||

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on September 6, 2013 at 2:54pm — 10 Comments

बढ़े कला संगीत, मिटे ना लेकिन पशुता-

गुरु-गुरुता गायब गजब, अजब आधुनिक काल । 

गुरुजन रहे खिलाय गुल, गुलछर्रे गुट बाल । 

 

गुलछर्रे गुट बाल, चाल चल जाय अनोखी । 

नीति नियम उपदेश, लगें ना बातें चोखी । 

 …

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Added by रविकर on September 5, 2013 at 3:30pm — 11 Comments

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