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'हौले हौले बह समीर मेरा लल्ला सोता है '

'हौले हौले बह समीर मेरा लल्ला सोता है '



हौले हौले बह समीर मेरा लल्ला सोता है ,
मीठी निंदिया के अर्णव में खुद को डुबोता है .
हौले हौले बह समीर मेरा लल्ला सोता है !

मखमल सा कोमल है लल्ला नाम है इसका राम ,
मैं कौशल्या वारी जाऊं सुत मेरा भगवान ,
ऐसा सुत पाकर हर्षित मेरा मन होता है !
हौले हौले बह समीर मेरा लल्ला सोता है !

मुख की शोभा देख राम की चन्द्र भी है शर्माता ,
मारे शर्म के हाय ! घटा में जाकर है छिप जाता ,
फिर चुपके से मुख दर्शन कर धीरज खोता है !
हौले हौले बह समीर मेरा लल्ला सोता है !

स्वप्न अनेकों देख रहा है सुत मेरा निंद्रा में ,
अधरों पर मुस्कान झलकती राम के क्षण क्षण में ,
मधुर स्वप्न के पुष्पों को माला में पिरोता है !
हौले हौले बह समीर मेरा लल्ला सोता है !

शिखा कौशिक 'नूतन'
मौलिक व् अप्रकाशित

Views: 508

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Comment by Ashok Kumar Raktale on April 23, 2013 at 1:18pm

सुन्दर रचना.

Comment by shikha kaushik on April 20, 2013 at 2:31pm
utsahvardhak tippani hetu coontee ji ,kewal ji v shyam ji -hardik aabhar
Comment by Shyam Narain Verma on April 20, 2013 at 10:07am

BAHOT KHOOB...........

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 20, 2013 at 9:42am

आ0 शिखा कौशिक जी,अतिसुन्दर प्रस्तुति,  हार्दिक बधाई स्वीकारें।  सादर,

Comment by coontee mukerji on April 20, 2013 at 12:59am

राम नवमी के अवसर पर बहुत सुंदर सौगात . लोरी तो जैसे हम भूल ही गाये हैं . अति सुंदर भाई कौशिक जी . बधाई स्वीकार करें .

सादर  , कुंती .

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