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ग़ज़ल "संदली सा बदन है क्या कहिये"

========ग़ज़ल=======

संदली सा बदन है क्या कहिये
फूल जैसी छुअन है क्या कहिये

जल उठा है बदन तुझे छूकर
हुश्न है या अगन है क्या कहिये

सर से पा तक तुझे वो छूता है
आपका पैरहन है क्या कहिये

तीर नज़रो के जब चलें दिल पर
होती मीठी चुभन है क्या कहिये

घर मेरा आप जैसा गुल पा कर
खुद को समझे चमन है क्या कहिये

इश्क का रोग लग गया शायद
खोया खोया जेहन है क्या कहिये

हमसे नज़रें चुराते फिरते हैं  
राज-ए-उल्फत दफ़न है क्या कहिये

"दीप" सब जानते हैं ये तेरी
दिल्लगी आदतन है क्या कहिये

संदीप  पटेल  "दीप"

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on February 3, 2013 at 11:11pm

सर से पा तक तुझे वो छूता है
आपका पैरहन है क्या कहिये

तीर नज़रो के जब चलें दिल पर
होती मीठी चुभन है क्या कहिये

घर मेरा आप जैसा गुल पा कर
खुद को समझे चमन है क्या कहिये

वाह भाई संदीप जी सादर, सुन्दर गजल क्या कहिये. बधाई स्वीकारें.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 3, 2013 at 2:31pm

कोमल सी सुन्दर ग़ज़ल के लिए बधाई आ. संदीप जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 3, 2013 at 2:10pm

भाईजी, पारंपरिक ग़ज़लगोई कीजिये, मगर उन्हीं बिम्बों से कुछ नयापन भी तो दिखे, ये कहना था मेरा. शृंगार बुरा विषय थोड़े न है..

:-)))


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on February 3, 2013 at 11:39am

श्रृंगार रस से सराबोर इस झूमती हुई गज़ल के लिए बधाई..........

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on February 3, 2013 at 10:48am

आदरणीय विजय सर जी तहे दिल से शुक्रिया इस हौसलाफजाई के लिए

स्नेह यूँ ही बनाये रखिये

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on February 3, 2013 at 10:48am

आदरणीय गुरुदेव सौरभ सर जी सादर प्रणाम

गुरुदेव इस बार मैंने पारम्परिक ग़ज़ल कहने का प्रयास किया है जिसमें श्रिंगार को पिरोने की कोशिश की है

आपकी आशाओं में खरा उतरने का भरसक प्रयास करूँगा

स्नेह और आशीष बनाये रखिये

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on February 3, 2013 at 10:46am

आदरणीया महिमा जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया ग़ज़ल की पसंदगी के लिए

Comment by vijay nikore on February 3, 2013 at 8:08am

गज़ल अच्छी लगी।

विजय निकोर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 3, 2013 at 7:11am

घर मेरा आप जैसा गुल पा कर
खुद को समझे चमन है क्या कहिये 

हर संतुष्ट पति का दिल स्वर पा गया है. .. :-))))

वैसे, पूरी ग़ज़ल के परिप्रेक्ष्य में कहूँ तो आपसे कुछ और बेहतर की अपेक्षा ग़लत नहीं है.. .

Comment by MAHIMA SHREE on February 2, 2013 at 10:56pm

क्या बात है ...बधाई स्वीकार करें

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