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जिस प्रकार के भवन की कल्पना बादशाह ने की थी यह भवन उससे भी कहीं अधिक सुन्दर बना था, जिसकी भव्यता देखकर बादशाह की आँखें चौंधिया सी गईं थीं. चहुँ ओर भवन निर्माण करने वाले शिल्पकार की मुक्तकंठ से प्रशंसा हो रही थी. जिसे सुनकर शिल्पकार भी फूला नहीं समा रहा था. लेकिन तभी अचानक बादशाह ने शिल्पकार के दोनों हाथ काट देने का आदेश दे दिया ताकि शिल्पकार पुन: ऐसी शानदार इमारत का निर्माण न कर सके. सुबह होते ही शिल्पकार के दोनों हाथ काट दिए गए. लेकिन अपने कटे हाथ देख शिल्पकार जोर जोर से ठहाके मार कर हँसने लगा, उसके ठहाके रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. यह हरकत देख कर वहां उपस्थित भीड़ मानो सकते में आ गई. एक व्यक्ति ने आगे बढ़कर पूछा:
"दोनों हाथ गंवाकर भी हँस रहे हो, पागल हो गए हो क्या ?"
"पागल मैं नहीं तुम्हारा बादशाह हो गया है ?
"वो कैसे ?"
"वो मूर्ख शायद ये भूल गया कि शिल्प मेरे हाथों में नहीं, मेरी आत्मा में बसता है."

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Comment by Yogi Saraswat on July 4, 2012 at 2:40pm

खुद पर भरोसा , बड़ी बड़ी लड़ाईयां  जिता देता है ! बहुत सार्थक रचना

Comment by AVINASH S BAGDE on July 3, 2012 at 8:33pm

wah!Yograj ji,

शिल्प.. आत्मा में बसता है."

Comment by Rekha Joshi on July 3, 2012 at 6:37pm

आदरणीय प्रभाकर जी ,बधाई ,त्रुटिके लिए क्षमा प्रार्थी 

Comment by Rekha Joshi on July 3, 2012 at 6:35pm

 णीय प्रभाकर जी ,सुंदर लघु कथा  "वो मूर्ख शायद ये भूल गया कि शिल्प मेरे हाथों में नहीं, मेरी आत्मा में बसता है.",बहुत बढ़िया ,बधाई 

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on July 2, 2012 at 11:13pm

"वो मूर्ख शायद ये भूल गया कि शिल्प मेरे हाथों में नहीं, मेरी आत्मा में बसता है."

आदरणीय योगराज जी ..शिल्प आत्मा में बसती है ...क्या बात कही आप ने जान आ गयी रचना में ....सच है ...आप इस लघु कथा में माहिर अद्भुत कौशल रखते हैं  ..जय श्री राधे 
भ्रमर ५ 

 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 2, 2012 at 10:07pm

हाथ के कटने के ऐतिहासिक बिम्ब को जिस प्रकार का कोण दिया गया है वह, आदरणीय योगराजभाईजी, आपकी लघुकथा विधा पर अद्भुत सिद्धहस्तता का परिचायक है.

सादर बधाई स्वीकृत कर अनुगृहित करें.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 2, 2012 at 8:30pm

वो मूर्ख शायद ये भूल गया कि शिल्प मेरे हाथों में नहीं, मेरी आत्मा में बसता है."इस एतिहासिक लघु कथा के माध्यम से योगराज  जी  आपने बहुत अच्छी शिक्षाप्रद बात कही है ..बहुत अच्छा लगा पढ़ कर |

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on July 2, 2012 at 4:46pm
आदरणीय योगराज सर, सुन्दर कहानी प्रस्तुत करने के लिए बधाई स्वीकारेँ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 2, 2012 at 3:49pm
व्यंगात्मकता से बहुत गहन सन्देश देती, ऐतिहासिक लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय प्रधान संपादक महोदय.
शिल्प तो सचमुच आत्मा में ही बसता है.. और सच्चे शिल्पकार  का शिल्प हाथों का मोहताज भी नहीं.....
 
"पागल मैं नहीं तुम्हारा बादशाह हो गया है ?
"वो कैसे ?"
"वो मूर्ख शायद ये भूल गया कि शिल्प मेरे हाथों में नहीं, मेरी आत्मा में बसता है."
 
माउंट आबू के दिलवारा जैन मंदिर याद आ गए इस लघुकथा को पढ़ कर. पुनः बधाई इस timeless लघुकथा पर.
Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on July 2, 2012 at 12:25pm

आदरणीय अग्रज,

सादर लघु कथा में व्यापकता लिया हुआ सन्देश समाहित है! आपकी लेखनी को नमन..

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