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या खुदा मेरी उल्फत को जिंदगी दे दे 
गम जुदाई काअब और सहा नही जाता |
तडप तडप के गुजारी है हर घड़ी हर पल ,
मेरी वफा का दिया जल जल के बुझा जाता है |
इंतजार और अभी,और अभी और अभी ,
सब्रे पैमाना अब लब से छुटा जाता है |
रात में यह दिल तन्हां डूब जाता है ,
मायूसियों के आलम में दम घुटा जाताहै 

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Comment by अरुन 'अनन्त' on June 29, 2012 at 4:33pm

आपका स्वागत है

Comment by Rekha Joshi on June 29, 2012 at 2:58pm

अरुण जी प्रोत्साहन के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by अरुन 'अनन्त' on June 29, 2012 at 1:27pm

वाह बेहद खुबसूरत ग़ज़ल रेखा जी.

Comment by Sarita Sinha on May 21, 2012 at 2:47pm

आदरणीय रेखाजी, नमस्कार, 

आपका "रिटायर्ड " शब्द हज़म नहीं होता, आंखें मल मल के आपकी फोटो देखती हूँ...अगर ताज़ा फोटो है तो कमाल  है.......
कविता की तारीफ करना तो भूल ही गयी...बहुत ख़ूबसूरत..
Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on May 20, 2012 at 1:22pm

दर्दे हिज्र को बड़े सटीक शब्दों में बयान करती हुई रचना के लिए बहुत बहुत बधाई रेखा जी !! सुंदर अभिव्यक्ति !!

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 18, 2012 at 7:44pm

रेखा जी
      सादर,
           रात में यह दिल तन्हां डूब जाता है ,
           मायूसियों के आलम में दम घुटा जाताहै
सुन्दर रचना. लिखती रहें.

Comment by Rekha Joshi on May 17, 2012 at 10:03pm

आदरणीय सौरभ जी प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 17, 2012 at 9:50pm

रचना के सकारात्मक प्रयास हेतु हार्दिक शुभकामनाएँ

Comment by AjAy Kumar Bohat on May 17, 2012 at 9:19pm

इंतजार और अभी,और अभी और अभी ,
सब्रे पैमाना अब लब से छुटा जाता है |

kya hi lajawab panktiyan hain, Badhai Rekha ji.... 

Comment by Rekha Joshi on May 17, 2012 at 11:36am

thanks yogi ji 

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