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अहसास की ग़ज़ल : मनोज अहसास

2122     2122      2122      212

वक्त इतना भी कठिन कब है,ज़रा महसूस कर।
एक रोशन दिन की ये शब है,ज़रा महसूस कर।

खुद को तन्हा कहना तेरी भूल है, इतना समझ
हर कदम साथी तेरा रब है,ज़रा महसूस कर।

मिल ही जाएगी तेरी मंज़िल अगर चलता रहा
रास्ता थोड़ा सा ही अब है,ज़रा महसूस कर।

तू नहीं पहला बशर है ठोकरों की चोट में,
सालों से चलने का ये ढब है ज़रा महसूस कर।

बेबसी, मायूसियाँ,नाक़ामियाँ, रुसवाईयाँ,
जिंदगी की ये ही तो छब है जरा महसूस कर।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 12, 2022 at 9:22pm

आ. भाई मनोज जी, सादर अभिवादन। अच्छी गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 12, 2022 at 11:25am

उम्दा ग़ज़ल कही भाई मनोज जी...बधाई

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