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फूल काँटों में खिला है- ग़ज़ल

२१२२ २१२२ 

फूल काँटों में खिला है, 

प्यार में सब कुछ मिला है. 

 

है न कुछ परिमाप गम का, 

गाँव है, कोई जिला है. 

 

झोंपड़ी का देखकर गम,

तख़्त कब कोई हिला है. 

 

है कहाँ जाना न मालूम,

क्या गजब ये काफिला है. 

 

हो अगर संवाद दिल से,

खत्म हर शिकवा गिला है. 

 

तोडना उसको है मुश्किल,

ख़्वाहिशों का जो किला है.

 

दर्द सँग किलकारियाँ हैं,

जिंदगी का सिलसिला है.

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on November 9, 2020 at 6:45pm

आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसलाअफजाई का दिल से शुक्रिया 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 1, 2020 at 8:46pm

बेहतरीन ग़ज़ल कही आदरणीय शर्मा जी...दूसरे शे'र में जो विशेषण दिये वो कमाल हैं...

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 31, 2020 at 12:44pm

आदरणीय Samar kabeer जी सादर नमस्कार 

जी उत्तम जानकारी दी आपने , आपकी इस्लाह से हमेशा ही मेरा मार्गदर्शन होता है. सादर नमन , कुछ और सोचता हूँ 

Comment by Samar kabeer on October 27, 2020 at 8:30pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

'गाँव है, कोई जिला है' 

इस मिसरे में सहीह शब्द है "ज़ि'लअ" इसका वज़्न ज़रूर 12 है,मगर इसे 'ला' के क़ाफ़िये के साथ नहीं ले सकते,ग़ौर करें ।

'ख़्वाहिशों का जो किला है'

इस मिसरे में सहीह शब्द है "क़ल'अ:" इसे भी 'ला' के क़ाफ़िये के तौर पर नहीं ले सकते,देखियेगा ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 27, 2020 at 2:53pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसला अफजाई के लिए दिल से शुक्रिया 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 24, 2020 at 10:57am

आ. भाई बसंत जी, सादर अभिवादन । उत्तम गजल हुई है । हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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