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अहसास की ग़ज़ल :मनोज अहसास

2×15

इतने दिन तक साथ निभाया उतना ही अहसान बहुत.
दिल का क्या है, ख़ाली घर था, थे इसमें अरमान बहुत.

हैरानी से पूछ रहा था इक बच्चा नादान बहुत,
गर्मी के मौसम में ही क्यों आते हैं तूफान बहुत.

हद से ज्यादा देखभाल का कोई लाभ नहीं पाया,
मेरे हाथों मेरे घर का टूट गया सामान बहुत.

ऐसे ऐसे मोड़ हमारे रस्ते में आये यारो,
जिनमें फंसकर लगने लगा था जालिम है भगवान बहुत.

फिर इक दिन वो मुझसे मिलकर दिल की बात बताएंगे,
इस आशा में काट रहा हूँ जीवन पथ सुनसान बहुत.

सीधी-सादी बात यहाँ पर समझ नहीं पाता कोई,
और तसल्ली देते सबको दीवारों के कान बहुत.

मेरे साथी मैं सारा दुख इक मिसरे में कहता हूँ,
तुझसे जुदा होकर लगता है,मरना है आसान बहुत.

बहरे मीर में लिखने का भी अपना सुख है दीवानों,
यूँ तो ग़ज़लों को कहने में हासिल है अरकान बहुत.

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 29, 2020 at 12:44pm

आ. भाई मनोज अहसास जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by मनोज अहसास on July 29, 2020 at 1:41am

आदरणीय रवि शुक्ला जी

ग़ज़ल पर उपस्थिति के लिए हार्दिक आभार

सादर

Comment by मनोज अहसास on July 29, 2020 at 1:40am

आदरणीय अमीर साहब 

सुझाव के लिए हार्दिक आभार सादर

Comment by Ravi Shukla on July 21, 2020 at 12:01pm

आदरणीय मनोज अह्सास जी , अच्छी ग़ज़ल हुई है बधाई स्वीकार करें।

कुछ तो सोचा होगा उसने दुनिया देख रहा है जो 

आप भले कह लें उसको ये ज़ालिम है भागवान बहुत 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on July 21, 2020 at 12:50am

जनाब मनोज अह्सास जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है बधाई स्वीकार करें।

उर्दू के लफ़्ज़ों ज़्यादा, ज़ालिम में नुक़्ता लगा लें। सादर। 

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